१७८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७
समाधानः– भाई! ते कई अपेक्षाए छे? अरे, (ज्ञानीनो) शुभभाव अशुभभावने निर्जरे छे ज्यारे शुद्धभाव तो बधाने-शुभ तेम ज अशुभने-निर्जरे छे. आवी अपेक्षा त्यां छे. पण शुं थाय? (ज्यां अपेक्षा ज न समजे त्यां?)
अहीं तो भगवान कुंदकुंदाचार्यनी आ गाथानो भाव आचार्य अमृतचंद्रदेव टीकामां दोही-दोहीने बहार काढे छे. जेम कोई बळुकी बाई गायना-भेंसना आळुमां जे दूध छे-जे अंदर छे-तेने दोहीने-खेंचीने बहार काढे छे तेम आचार्यदेव तर्कनी भींस दईने गाथामां जे अंदरमां भाव भर्या छे ते बहार काढे छे. कहे छे-एक ज्ञाननुं एकनुं ज आलंबन लेवुं केमके ते वडे ज मुक्ति छे. गाथा ज छे ने! जुओने!
सो एसो परमट्ठो जं लहिदुं णिव्वुदिं जादि।।
आत्मा ते एक परमार्थरूप ज्ञानपदने पामीने मुक्ति पामे छे; व्यवहारने पामीने मुक्ति पामे छे एम छे ज नहि. भाई! आ तो जे छे तेनुं स्पष्टीकरण छे.
अहाहाहा...! कहे छे-त्रिकाळी एकरूप ज्ञायकभाव अर्थात् जाणगशक्तिनुं सत्त्व एवुं जे ज्ञान ते ज्ञाननुं ज एकनुं आलंबन लेवुं. अहीं बे वात करी ने!
१. ज्ञाननुं ज, अने ते पण २. एकनुं आलंबन लेवुं. अहाहाहा...! वस्तु-आत्मा अंदर एकला ज्ञाननुं निधान स्वच्छताना-निर्मळताना भावथी परिपूर्ण भरेलुं पडयुं छे; ते महाप्रभु छे, माटे तेनुं आलंबन ले, शरण ले; मोटानुं शरण ले. ते मोटो प्रभु! तुं ज अंदरमां छो. अहाहाहा...! जाणवुं-जाणवुं-जाणवुं एवो सहज जेनो स्वभाव छे एवा ज्ञाननो एकरूप दरियो प्रभु तुं ज छो. तुं त्यां जा, तेमां आश्रय पाम, तेनुं आलंबन ले. ल्यो, आ तो एकलुं निश्चयनुं ज आलंबन लेवुं एम कहे छे. भाई! मारग ज आ रीते छे तेमां बीजुं शुं थाय? श्रीमद् राजचंद्रे पण कह्युं छे के-‘‘अनेकान्त पण सम्यक् एकान्त एवा निजपदनी प्राप्ति सिवाय अन्य हेतुए उपकारी नथी.’’ माटे जे सम्यक् एकान्त छे एवा निज ज्ञानस्वभावनुं ज एकनुं आलंबन लेवुं.
भाई! जेम त्रिकाळी द्रव्य छे तेम वर्तमान वर्तमान वर्तती तेनी पर्याय पण छे; आवुं अनेकान्त छे. छतां सम्यक् एकान्त एवा निजपदनी प्राप्ति सिवाय अन्य हेतुए अनेकान्त उपयोगी नथी. एथी ए नक्की थयुं के देव-गुरु-शास्त्रनी भक्ति आदिना रागथी जीवने लाभ थाय एम छे नहि. एक शुद्ध त्रिकाळी द्रव्यनुं आलंबन लई