समयसार गाथा-२०४ ] [ १७९ तेमां ज एकाग्रता करवी ए कर्तव्य छे केमके तेना आलंबनथी ज निजपदनी प्राप्ति थाय छे. अहीं ए ज कहे छे के-
‘आत्मस्वभावभूत ज्ञाननुं ज एकनुं आलंबन करवुं; तेना आलंबनथी ज (निज) पदनी प्राप्ति थाय छे.’ आत्मा सदा एकरूप ज्ञानानंदस्वभावी वस्तु छे. ते एकना आलंबनथी ज निजपदनी प्राप्ति थाय छे.
प्रश्नः– आमां तो ‘ज’... ‘ज’... एम आवे छे; त्यारे ‘श्रीमद् राजचंद्र’मां एक पत्रमां मारो भगवान ‘ज’ न कहे, मारो महावीर ‘ज’ न कहे-एम आवे छे ने?
समाधानः– भाई! त्यां तो वस्तु द्रव्ये नित्य छे, पर्याये अनित्य पण छे एम अपेक्षाथी वात छे. आत्मा नित्य ज छे, वा अनित्य ज छे एम नहि; आत्मा एक ज छे, वा अनेक ज छे एम नहि. परंतु द्रव्ये एक छे तो पर्याय अपेक्षाए अनेक पण छे; द्रव्य त्रिकाळ रहे छे ए अपेक्षाए नित्य छे तो पर्याय अपेक्षाए अनित्य पण छे-एम वस्तुना द्रव्य-पर्यायस्वरूपनुं कथन छे. ज्यारे अहीं तो आलंबन कोनुं लेवुं एनी वात छे. तो कहे छे-त्रिकाळी द्रव्यनो जे एकरूप ज्ञानस्वभाव ते एकनुं ज आलंबन लेवुं केमके ते एकना आलंबनथी ज निजपदनी प्राप्ति थाय छे.
प्रश्नः– तमे तो निश्चयनी ज वात करो छो पण तेनुं कांई साधन छे के नहि? समाधानः– भाई! आ (आत्मा) ज साधन छे, केमके आत्मामां करण नामनो गुण छे. आत्मामां जेम ज्ञानस्वभाव त्रिकाळ छे तेम करण नामनो गुण पण त्रिकाळ छे. तेनुं (गुणथी अभेद आत्मानुं) आलंबन लेतां साधनदशा प्रगट थाय छे. कोईने एम थाय के-शुं साधननी आवी व्याख्या? पण भाई! आ ज तारा हितनो पंथ छे. भगवान! तुं रागना पंथे तो अनादिथी पडेलो छे, पण बापु! ए तो अहितनो दुःखनो पंथ छे. अहीं कहे छे-शुद्ध चैतन्यस्वभावमय त्रिकाळी भगवान आत्मानुं ज एकनुं वर्तमान ज्ञाननी पर्यायमां आलंबन लेवुं केमके तेना आलंबनथी ज निजपदनी प्राप्ति छे.
प्रश्नः– एक आत्माना आलंबनथी ज मुक्ति थाय-एम आप एकान्त करो छो. एने बदले कांईक निश्चयथी थाय अने कांईक व्यवहारथी-व्रतादिथी पण थाय एम कहो तो?
उत्तरः– भाई! कदीय त्रणकाळमां कोईनेय व्यवहारथी (धर्म, मुक्ति) न थाय. अहीं तो आ एक ज वात छे. जुओने! पाठमां आ ज छे के नहि? भाई! आ तो आचार्य अमृतचंद्रस्वामी आम पोकारे छे. अहा! तेओ तो भावलिंगी संत