Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१८० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७ निर्ग्रंथ दिगंबर मुनिवर हता. त्रण कषायना अभावसहित तेमने वीतरागी शान्ति प्रगट हती. अहो! तेओ अतीन्द्रिय आनंदना प्रचुर स्वसंवेदनमां ऊभा हता. कांईक विकल्प आवतां तेओ आ कहे छे के-भाई! तारे धर्म करवो छे ने? तो चैतन्यनुं निधान प्रभु आत्मा एकनुं ज आलंबन ले; तेना आलंबनथी ज निजपदनी प्राप्ति थाय छे. देव-गुरु- शास्त्र, पंच परमेष्ठी इत्यादिनुं (परनुं) आलंबन तो, वच्चे शुभराग आवे छे एटला पुरतुं निमित्तथी कह्युं छे. (वास्तवमां तेओ आलंबन छे नहि).

अहाहाहा...! ज्ञानानंदस्वभावना एकना आलंबनथी ज ज्ञानस्वभावमय जे निजपद तेनी प्राप्ति थाय छे. आ अस्तिथी वात करी. हवे कहे छे-तेना आलंबनथी ज ‘भ्रांतिनो नाश थाय छे,’ -आ नास्तिथी कह्युं. निजपदना आलंबनथी ज निजपदनी प्राप्ति थाय छे अने भ्रान्तिनो नाश थाय छे. भाई! बीजी कोई रीते मिथ्यात्वनो नाश थतो नथी एम कहे छे. भाई! तुं राग ने विकल्पने आत्मामां मिलावट करीने माने छे पण ए तो मिथ्याबुद्धि छे. अहीं तो आ कहे छे के-आत्मा चंद्रमानी जेम शीतळ-शीतळ- शीतळ वीतरागी शीतळताना स्वभावथी भरेलो एकरूप जिनचंद्र प्रभु छे. ते तेना आलंबनथी ज प्राप्त थाय छे.

त्यारे केटलाक कहे छे-अमने आ मोंघुं (कठण) पडे छे, कोई सोंघो (सहेलो) मारग छे के नहि?

अरे भाई! जेम शीरो करे छे त्यारे पहेलां लोटने घीमां शेके छे अने पछी अंदर साकरनुं पाणी नाखे छे. पण आ रीत मोंघी पडे छे एम जाणी कोई लोटने साकरना पाणीमां पहेलां शेके अने पछी घी नाखे तो? तो शीरो तो शुं लोपरीय ना थाय. समजाणुं कांई...? तेम भगवाननो आ मारग मोंघो (कठण) पडे छे एम जाणी अज्ञानी पहेलां व्रत, तप, आदि करवा मंडी पडे छे. पण अरे भगवान! जेने तुं सोंघो (सहेलो) मारग माने छे ते सोंघो मारग नथी बापा! ते मारग ज नथी. एनाथी निजपदनी प्राप्ति नहि थाय, मिथ्यात्वनो नाश नहि थाय. रागना आलंबनथी तो रागनी-दुःखनी- चारगतिना कलेशनी ज प्राप्ति थशे. आवी वात छे.

भाई! तुं त्रिकाळी एकरूप जे ज्ञायकभाव छे तेनुं आलंबन लईश तो तने ज्ञायकभावनी प्राप्ति थशे. निजसत्त्वरूप जे ज्ञायकभाव तेनी प्राप्ति थतां ‘हुं रागवाळो छुं ने हुं पर्याय जेटलो छुं’-इत्यादि जे परमां भ्रान्ति छे तेनो अर्थात् मिथ्यात्वनो नाश थशे. मिथ्यात्वना नाश थवानो आ एक ज उपाय छे.

कहे छे-‘तेना (ज्ञायकभावना) आलंबनथी ज भ्रान्तिनो नाश थाय छे, आत्मानो लाभ थाय छे, अनात्मानो परिहार सिद्ध थाय छे,...’