Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-२०४ ] [ १८१

शुं कह्युं? के एक ज्ञायकभावना आश्रये ज आत्मानो लाभ थाय छे अर्थात् आत्मा जे परम पवित्र पदार्थ छे तेनो पर्यायमां लाभ थाय छे. पहेलां निजपदनी प्राप्ति कही हती ने? आ एनो ज विशेष खुलासो कर्यो के-आत्मलाभ थाय छे. आ वाणीया नवुं वरस बेसे त्यारे लखे छे ने के-‘‘लाभ सवाया.’’ हवे त्यां तो धूळमांय लाभ सवाया नथी सांभळने! ए तो बधी कषायनी होळी छे. लाभ तो आ (आत्मलाभ थाय ते) छे, जेमां भ्रान्तिनो नाश थई अतीन्द्रिय आनंदनी प्राप्ति थाय छे.

कोईए हमणां कह्युं छे के सोनगढ हवे हजारोनी आव-जानुं केन्द्रस्थान छे. अरे भाई! तारुं केन्द्रस्थान तो अंदर भगवान आत्मा छे के जेमां नजर जतां तने तारा चैतन्यनिधाननी प्राप्ति थाय छे, आत्मानो लाभ थाय छे. भाई! आ पैसानो लाभ थाय वा रागनो लाभ थाय तो तेथी शुं? ए तो बधां खरेखर दुःखनां ज कारण छे.

हा, पण पैसानो लाभ होय तो अहीं सांभळवा रही शकाय ने? धूळेय रहेवाय नहि, सांभळने! पैसानो लाभ तो घणायने छे, पण रहे छे कयां? अरे! पैसावाळाने तो घणां लाकडां (शल्य) होय छे. आ छापरुं होय छे तेमां एक एक वळीने एक-एक खीलो होय छे पण मोभने? मोभने अनेक खीला होय छे. तेम मोटो शेठ थाय तेने घणा खीला वागे छे; एक स्त्रीनो खीलो, एक पुत्रनो खीलो, एक वेपार- उद्योगनो खीलो-एवा बीजा पारावार खीला एने वागे छे. बिचारो शुं करे? एने सांभळवा रहेवानी कयां नवराश छे? पण बापु! अवसर तो चाल्यो जशे अने संसार (दुःख) ऊभो रहेशे हों.

माटे कहे छे-निर्मळानंदनो नाथ प्रभु तुं अंदर छे तेनुं आलंबन ले. तेम करतां ज तने आत्मलाभ थशे. भाई! पैसामां धूळेय लाभ नथी अने दया, दान, व्रत आदि शुभरागना परिणाममांय लाभ नथी. ए सर्वमां (बहारमां) लाभ मानीने तो अनंतकाळ दुःखमां मरी गयो छे. हवे द्रष्टि फेरवी दे अने ज्यां अतीन्द्रिय महापदार्थ प्रभु तुं अंदर पडयो छे त्यां द्रष्टि कर अने तेनो ज आश्रय कर, तेमां ज एकाग्र था. तेथी तने आत्मलाभ थशे अने अनात्मानो परिहार थई जशे.

शुं कह्युं? के अंतरस्वरूपमां एकाग्र थतां अर्थात् तेनुं आलंबन लेतां आत्मलाभ थाय छे, आत्मानी निराकुळ शान्तिनो लाभ थाय छे अने अनात्मानी अर्थात् रागादिनो परिहार सिद्ध थई जाय छे. अहा! आ स्वभावनुं ग्रहण थतां अनात्मानो-रागादिनो त्याग सिद्ध थई जाय छे एम कहे छे. केवी सरस वात! जाणे एकलुं अमृत!

हा; एनो (अमृतनो) प्रचार थवो जोईए. अरे भाई! आत्मा अंदरमां प्रचार करे के बहार? अहीं तो अंदरना प्रचारनी वात छे. बहारमां तो ए करे ज शुं? (कांई नहि). भाषा तो जुओ! के अंतरना