Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१८२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७ आलंबनथी ज आत्मानो लाभ थाय छे अने अनात्मानो अभाव थाय छे. जुओ, आनुं नाम त्याग छे. बहारनो त्याग केवो? बहारनी चीज कयां अंदर पेसी गई छे के तेनो त्याग करे? आ तो तारी पर्यायमां जे (अशुद्धता) छे तेना त्यागनी वात छे. अहाहाहा...! ‘अनात्मानो परिहार सिद्ध थाय छे.’ एटले शुं? एटले के जेटला अंशे अंदरना आलंबनमां गयो तेटला अंशे अनात्मानो-रागनो परिहार-त्याग सिद्ध थाय छे. आ आत्मानुं ग्रहण थाय छे त्यारे अनात्मानो त्याग सिद्ध थाय छे. ल्यो, आ ग्रहण ने त्याग छे.

पहेलां आव्युं ने के-‘जेमां समस्त भेद दूर थया छे एवा आत्मस्वभावभूत ज्ञाननुं ज एकनुं आलंबन करवुं.’ तेनो अर्थ एम छे के पर्यायने द्रव्य भणी वाळवी, अने पर्यायमां त्रिकाळी द्रव्यनां ज्ञान ने श्रद्धान करवां. पर्याय छे तो एक समयनी पण ते आखा त्रिकाळीने जाणे छे, श्रद्धे छे. अहो! एक समयनी पर्यायनुं एवुं अद्भुत सामर्थ्य छे के ते अंतर एकाग्र थतां आखा द्रव्यने जाणे छे. समजाणुं कांई...? अज्ञानीने आ वात बेसती नथी तेथी ‘एकान्त छे एकान्त छे’-एम राडो नाखे छे; पण शुं थाय? (अंतर- एकाग्र थया विना कांई ज बेसे एम नथी)

अहाहाहा...! एकरूप-एकरसरूप ज्ञान छे, एकरसरूप आनंद छे, एकरसरूप श्रद्धा छे. एम बधुं (अनंत गुणथी भरेलुं) एकरसरूप-एकरूप त्रिकाळ छे. तेथी आ एकनुं ज आलंबन लेवुं जेथी भेद दूर थई जाय. तेना आलंबनथी ज आत्मलाभ थाय छे अने अनात्मानो त्याग थई जाय छे. आ वस्तुस्थिति छे. छतां अज्ञानी व्यवहार... व्यवहार... व्यवहार-एम पक्ष कर्या करे छे. अरे भाई! व्यवहार छे खरो; पूर्ण वीतरागता न थाय त्यां सुधी ज्ञानीने व्यवहार होय छे परंतु ते हेय छे. अहाहा...! जेने अंदर आत्मानुं भान वर्ते छे ए अंतरात्माने व्यवहार होय छे, आवे छे पण ते हेयस्वरूपे छे. गजब वात भाई!

परमार्थ वचनिकामां कह्युं छे के-‘‘हेय-त्यागरूप तो पोताना द्रव्यनी अशुद्धता, ज्ञेय-विचाररूप अन्य षट्द्रव्यस्वरूप, उपादेय-आचरणरूप पोताना द्रव्यनी शुद्धता.’’ आचरणरूप शुद्धताने उपादेय कही छे; केमके भासभान तो शुद्धतामां थाय छे, माटे शुद्धताने अहीं उपादेय गणी छे. अशुद्धताने हेय-त्यागरूप कही छे. ज्यां सुधी पूर्ण वीतराग-सर्वज्ञ न थाय त्यां सुधी साधकने पर्यायमां अशुद्धता तो छे, पण छे ते हेय. अज्ञानीने आ आकरुं पडे छे, पण शुं थाय? भाई! व्यवहार व्यवहारना स्थानमां छे. पूर्ण वीतराग न होय त्यारे, स्वभावनो जेटलो आश्रय वर्ते छे तेटली तो निर्मळता छे, परंतु पूर्ण आश्रय नथी एटले तेटलो व्यवहारनो आश्रय तेने आव्या विना रहे नहि, पण छे ते बंधनुं कारण, छे ते हेयरूप ज.