समयसार गाथा-२०४ ] [ १८३
अहीं कहे छे-अंतरस्वरूपनी एकाग्रता थतां आत्मलाभ थाय छे अने अनात्मानो परिहार सिद्ध थाय छे. पर्यायमां जे अशुद्धता छे ते अनात्मा छे अने तेनो त्याग स्वरूपना ग्रहण वडे सिद्ध थाय छे. भाई! वस्तु तो आम ज छे. दुनिया माने के न माने; एकांत कहे के गमे ते कहे; जन्म-मरणथी रहित थवानो मारग तो आ ज छे. बापा! चार गतिमां तो बधेय दुःख छे. मोटुं शेठपद के राजपद हो तोपण एमां आकुळता ने दुःख ज छे. स्वर्गमांय आकुळता ज छे. संसारी प्राणीओ ज्यां हो त्यां बधे ज आकुळतानी भट्ठीमां शेकाई रह्या छे. निराकुळ आनंद अने शान्तिनुं धाम तो एक प्रभु आत्मा छे. तेने छोडीने कोई मंद कषाय करो तो करो, पण तेनाथी आत्मानी शांति अने आनंद तो दाझे ज छे. समजाणुं कांई...?
पद्मनंदी पंचविंशतिमां दानोपदेशना अधिकारमां आवे छे के-हे जीव! तने जे आ बे-पांच करोडनी संपत्ति मळी छे ते, जेना वडे आत्मानी शांति दाझेली ते पुण्यनुं फळ- उकडिया छे. जेम माणस माल-माल खाई ले अने पछी उकडियाने बहार फेंकी दे छे. अने त्यारे कागडो का, का, का,... एम अवाज करीने बीजा कागडाओने बोलावीने ते खाय छे, एकलो खातो नथी. तेम आचार्य कहे छे-हे आत्मा! तने जे आ संपत्ति-धूळ मळी छे ते तारी दाझेली शान्तिनुं फळ उकडिया छे. जो तुं ते एकलो खाईश तो कागडामांथी पण जईश. कागडो उकडिया मळे तो एकलो न खाय, तेम जो तुं आ संपत्ति एकलो भोगवीश अने दया, दान, भक्ति इत्यादिमां वापरीश नहि तो तुं कागडामांथी पण जईश. अहा! ज्यारे शुभभावनो अधिकार होय त्यारे धर्मीने केवा शुभभाव आवे छे ते तो बतावे ने? जोके ते शुभभाव छे हेय, छतां ते धर्मात्माने होय छे, आवे छे एनी वात छे. द्रव्यद्रष्टिए तो परमात्मा चोथे गुणस्थाने प्राप्त थयो छे. पण चारित्रनी पर्यायमां ज्यां सुधी पूर्ण प्राप्त न थाय त्यां सुधी स्वना आश्रयमां अधुराश छे तेथी, पूर्ण थयो नथी, स्वना आश्रयनी अधुराशमां परनो व्यवहार आव्या विना रहे नहि अने त्यारे दया, दान, व्रत, भक्ति इत्यादि शुभभाव तेने आवे छे. पण ते छे स्वद्रव्यनी अशुद्धता- हेय, हेय, हेय.
प्रश्नः– जो ते (-शुभभाव) हेय छे तो शा माटे करवा? समाधानः– ते करवानी तो वात ज कयां छे? ज्ञानीने ते करवानो अभिप्राय कयां छे? ए तो कह्युं ने के ज्यां सुधी स्वनो पूर्ण आश्रय थयो नथी त्यांसुधी स्वना आश्रयनी अधुराशमां तेने परनो व्यवहार-दया, दान, भक्ति आदिनो शुभभाव आवे छे, आव्या विना रहेतो नथी. पण ए छे हेय एम जाणवुं. आवी वात छे.