द्रष्टिथी ज जणाय एवुं छे. प्रमाणादिना विकल्पथी नहीं. तेथी प्रमाणादि विकल्पोमां पण आत्मा एक ज प्रकाशमान छे.
हवे कहे छे- ज्ञेय अने वचनोना भेदथी प्रमाण आदि अनेक भेदरूप थाय छे. ज्ञेयना प्रकारः नाम, स्थापना, द्रव्य, भाव वगेरे. ज्ञानना पण अनेक प्रकार छे- निश्चय, व्यवहार आदि. तेमां पहेलां प्रमाण बे प्रकारे छेः एक परोक्ष अने बीजुं प्रत्यक्ष. उपात्त अने अनुपात्त बे परद्वारो वडे प्रवर्ते ते परोक्ष छे. उपात्त एटले इन्द्रिय, मन वगेरे पर पदार्थो जे मेळवेला छे, अनुपात्त एटले प्रकाश, उपदेश वगेरे अणमेळवेला पर पदार्थो. ते बन्ने परद्वारोथी जणाय ते परोक्ष छे. जुओ, सर्वज्ञनी वाणी, आगमप्रमाण ए परोक्ष छे. अने केवळ आत्माथी ज प्रतिनिश्चितपणे प्रवर्ते, जेमां मन, इन्द्रिय आदि के उपदेश आदिनो संबंध नथी एवा आत्माना आश्रये ज सीधुं प्रवर्ते ते प्रत्यक्ष छे.
प्रमाणज्ञान पांच प्रकारे छेः मति, श्रुत, अवधि अने मनःपर्यय अने केवळज्ञान. तेमां मति अने श्रुतज्ञान बे परोक्ष छे, अवधि अने मनःपर्ययज्ञान ए बे विकल-प्रत्यक्ष छे अने केवळज्ञान सकल प्रत्यक्ष छे. आ रीते प्रत्यक्ष अने परोक्ष एम बे प्रकारनां प्रमाण छे. ते बन्ने, प्रमाता-जाणनार, प्रमाण-ज्ञान, प्रमेय-जाणवा लायक वस्तु-ए भेदोने अनुभवतां भूतार्थ छे. व्यवहारथी ए विकल्पो छे ए अपेक्षाए सत्यार्थ छे, पण ए कांई सम्यग्दर्शननो विषय नथी.
अने जेमां सर्व भेदो गौण थई गया छे, जेमां प्रमाणादिना भेदोनुं लक्ष अस्त थई गयुं छे एवा एक जीवना स्वभावनो अनुभव करतां तेओ अभूतार्थ छे. अनंत अनंत आनंद, ज्ञान, शांति, प्रभुता, इश्वरता आदि जेनुं एक स्वरूप छे एवा एकरूप चैतन्यनो अनुभव करतां ते प्रमाणना भेदो असत्यार्थ छे.
लोको कहे छे-रागनी मंदता करतां करतां अनुभव थाय. व्यवहार साधन अने निश्चय साध्य-एटले के कषायनी मंदता ए व्यवहार साधन होय तो निश्चय आवे. पण आ तद्न जूठी वात छे. अहीं तो कहे छे के प्रमाणना भेदो उपर ज्यांसुधी लक्ष छे त्यांसुधी सम्यग्दर्शननो विषय जे एकरूप आत्मा ते अनुभवमां आवतो नथी. जीवने क्रोध, मान, माया, लोभवाळो जाणवो ए तो पर्यायबुद्धि छे ज, पण तेने मति, श्रुत आदि पर्यायना (प्रत्यक्ष, परोक्ष प्रमाणना) भेदवाळो जाणवो ए पण पर्यायबुद्धि छे, मिथ्याद्रष्टि छे.
भगवाने कहेलो जे आत्मा एने जाणवा माटे आ उपायो कह्या ते (प्रथम अवस्थामां) साचा छे, केमके बीजा अन्यमतीओ आत्माने अनेक प्रकारे कल्पना करीने