सांभळवा पण न मळे ए शुं करे? क्यां जाय? निराधार, अशरण थईने चारगतिमां रखडया करे. अहीं शरणनी चीज शुं छे ए दर्शावतां कहे छे-प्रतिक्षण पर्याये पर्याये आ चैतन्य तो भिन्न प्रकाशमान-उद्योतमान छे.
आ आत्मा सर्व अवस्थाओमां विधविध रूपे देखातो हतो, भिन्न भिन्न पर्यायमां भिन्न भिन्न देखातो हतो; तेने शुद्धनये एक चैतन्यचमत्कारमात्र देखाडयो छे. ए वस्तुए सम्यक्दर्शननो विषय, आ एकरूप शुद्ध चैतन्यरूप आत्माना आश्रये सम्यग्दर्शन थाय छे; देव-गुरु-शास्त्रना आश्रये के शुभरागना आश्रये के उघाडरूप क्षयोपशमना आश्रये सम्यग्दर्शन थतुं नथी. तेथी हवे सदा एकाकार ज्ञायकभावनो ज अनुभव करो, पर्यायबुद्धिनो एकांत न राखो. पर्यायनो एकांत अनुभव मिथ्यात्व छे. तेथी पर्यायबुद्धि छोडो. एम बहारमां अने अंतरमां नग्न एवा दिगंबर संतो- कुंदकुंदाचार्य, अमृतचंद्राचार्य आदि गुरुओनो उपदेश छे.
नवतत्त्वोमां एक जीवने ज जाणवो भूतार्थ कह्यो. नवतत्त्वोमां जेटला भेदो छे ते सर्व दूर करी अभेद एक ज्ञायकभावने ज भूतार्थ कह्यो; केमके एक भूतार्थना ज आश्रये सम्यग्दर्शन थाय छे. आवी वस्तुस्थिति छे.
जेम नवतत्त्वोमां एक जीवने ज जाणवो भूतार्थ कह्यो तेम, एकपणे- ज्ञायकभावपणे प्रकाशमान आत्माना अधिगमना उपायो जे प्रमाण, नय, निक्षेप छे तेओ पण निश्चयथी अभूतार्थ छे, तेमां पण आत्मा एक ज भूतार्थ छे. एकपणे प्रकाशमान आत्माना अधिगमनो एटले जाणवानो वास्तविक उपाय तो ज्ञाननी पर्यायमां (भावश्रुत ज्ञानमां) एक अखंड ध्रुव ज्ञायकभावने जाणवो-अनुभववो ए छे. पण भगवान सर्वज्ञदेवे कहेली तत्त्ववस्तुने, परमतमां कहेला तत्त्वथी भिन्न जाणवा, निश्चित करवा (सविकल्प दशामां) जे प्रमाण, नय अने निक्षेप छे ते अधिगमना उपायो कह्या छे. छतां ए बधा विकल्पो छे. एना आश्रये वस्तुतत्त्वनो अनुभव प्राप्त थतो नथी. तेथी अंतरंग प्रकाशमान स्वरूपना अनुभवनी अपेक्षा ए सर्व निश्चयथी अभूतार्थ छे, जूठा छे. प्रमाण, नय, निक्षेपना भेदो जे प्रथम विकल्पकाळमां होय छे ते व्यवहारथी सत्य छे, पण अंतर अनुभवद्रष्टिमां ए बधा अभूतार्थ छे; केमके आवा विकल्पोथी आत्मा जणाय एवो नथी पण निर्विकल्प अनुभवथी ज जणाय एम छे. सहज आत्मस्वरूप ए स्वाभाविक सहज-