Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भाग-१ ] २०१

ढंकाएलो छे. त्यां कंचन, कामिनी अने कुटुंब तो कयांय बहार रही गयां-अजीवमां रही गयां. फक्त नवतत्वरूप भेदोना प्रेमनी आडमां आखो अभेद आत्मा ढंकाई गयो छे एम कहे छे.

भेदनी बुद्धि के रागनी बुद्धि ए ज पर्यायबुद्धि छे. मिथ्याद्रष्टिने मुख्य गुणोनी निर्मळ पर्याय तो छे ज नहीं. अस्तित्व, वस्तुत्व, प्रमेयत्व, अगुरुलघुत्व गुणनी पर्यायो निर्मळ छे; पण (सामान्यपणे) अंश जे पर्याय एनी प्रीतिमां आखो अंशी जे आत्मा त्रिकाळी शुद्ध लुप्त थई गयो छे. अरे! अनादिथी नवतत्त्वना भेदरूप वस्तुना अनुभवथी जीव मिथ्याद्रष्टि थई रह्यो छे. ए नवतत्त्वोमां संवर, निर्जरा, मोक्ष ए साचां नथी. (अपेक्षित छे). ज्ञायकभावनी द्रष्टि थतां ए साचा संवरादि प्रगट थाय छे अने त्यारे पर्यायबुद्धि रहेती ज नथी, होती ज नथी. (ज्ञायकभावनी द्रष्टि पर्यायबुद्धिना अभावपूर्वक होय छे) बापु! तुं जेनी रुचिमां होईश त्यां रहीश. अनंतकाळ रहेवुं तो छे ने? जो पर्यायबुद्धिनी रुचिमां होईश तो मिथ्यात्वमां रहीने चार गतिमां रखडीश. तथा जो द्रव्य-द्रष्टि-ज्ञायकनी द्रष्टिमां होईश तो निर्मळ परिणमन थतां संसारथी मुक्त थई निर्मळतामां रहीश. भाई! आ कांई वाद- विवादथी पार पडे एम नथी, आ तो सहजनो धंधो छे.

हवे कहे छे-‘वर्णमाला–कलापे निमग्नं कनकम् इव’ जेम वर्णोना समूहमां छुपायेल एकाकार सुवर्णने बहार काढे-एटले जुदा जुदा रंगभेदमां एकाकार सोनुं तो पडयुं ज छे तेने अग्निनी आंच आपी बहार काढे छे. आंच आपतां तेर-वलुं, चौद- वलुं. पंदर-वलुं एम वर्णभेद पडे एमां एकरूप एकाकार सुवर्ण पडयुं छे एने बहार काढे तेम ‘उन्नीयमानम्’ नवतत्त्वमां छुपायेली आत्मज्योति शुद्धनयथी बहार काढी प्रगट करवामां आवी छे. अहाहा...! ‘ज्ञान ते आत्मा’ ए जे अनुमान थाय ए पण विकल्प छे, भेद छे. पण ए विकल्पथी रहित एकलो ज्ञायकभाव शुद्धनयथी बहार काढी प्रगट करवामां आव्यो छे. ‘अथ’ माटे हे भव्यजीवो! ‘सततविवक्तं’ निरंतर आ चैतन्यज्योतिने अन्यद्रव्योथी तथा तेमनाथी थता पुण्य, पाप आदि नैमित्तिक भावोथी भिन्न ‘एकरूपं’ एकरूप ‘द्रश्यताम्’ देखो. सर्व प्रकारे एकरूपने अनुभवो. नवतत्त्वमां आ एकरूप ज्ञायक ज सर्वस्व छे, ए एक ज सम्यग्दर्शननो विषय छे. ते एकरूप ज्ञायकने छे, चारित्र तो पछी होय. तेथी कहे छे आ एकरूप आत्माने ज देखो-अनुभवो. ‘प्रतिपदम् उद्योतमानम्’ आ ज्योति पदे पदे अर्थात् पर्याये पर्याये एकरूप चित्चमत्कारमात्र प्रकाशमान छे. अरेरे! आवी वात