तत्त्वने भिन्न तारवी अनुभवे त्यारे नवनुं ज्ञान यथार्थ थयुं कहेवाय. पर्यायथी भेदरूप वस्तुने जाणे तो अनेकांत थाय एम नथी. पर्याय छे, नवना भेद छे-ए वात तो बराबर छे, परंतु एनो आश्रय लेवो, एने जाणवा, मानवा एतो मिथ्यादर्शन छे. श्रीमदे कह्युं छे के -‘अनेकांत पण सम्यक् एकांत एवा निजपदनी प्राप्ति सिवाय अन्य हेतुए उपकारी नथी.’
एकेन्द्रियथी मांडी पंचेन्द्रिय सुधीनी बधी पर्यायोमां पण वस्तु-द्रव्य तो ज्ञायकपणे ज छे. शुं ए द्रव्य कांई एकेन्द्रियनी पर्यायपणे थयुं छे? एम ए द्रव्य शुं आस्रवनी पर्यायपणे थयुं छे? एम बंधभावपणे द्रव्य थयुं छे? अहाहा...! ए तो ज्ञायक, ज्ञायक, ज्ञायकरूपे ज अनादि एकरूप रह्युं छे. एकेन्द्रिय, बे ईन्द्रिय, पंचेन्द्रिय ए कांई वास्तविक जीव नथी; अंदर जे ज्ञायकभाव छे ते जीव छे.
ज्यां सुधी जुदा जुदा नव पदार्थो जाणे,आ पुण्य, आ पाप, आ संवर, आ निर्जरा, एम वस्तुने भेदरूप जाणे; पण शुद्धनयथी आत्माने जाणे नहीं त्यांसुधी पर्यायबुद्धि छे, द्रव्यबुद्धि नथी. एक शुद्धनयथी आत्मवस्तुने जाण्या विना कदी सम्यग्दर्शन थाय नहीं.
शुद्धनयथी जीवने जाणवाथी ज समकित छे, अन्यथा नहीं. पर्यायथी वस्तुने जुए तो सम्यग्दर्शन थाय नहीं. द्रव्य साथे पर्यायने भेळवीने जुए तो पण समकित थई शके नहीं. द्रव्यद्रष्टिथी ज्यांसुधी आत्माने देखे नहीं त्यांसुधी पर्यायबुद्धि छे. नियमसारनी गाथा प नी टीकामां आवे छे के -अंतःतत्त्वरूप परमात्मतत्त्व अने बहिःतत्त्वनो कोई अंश भेळवीने श्रद्धा करवी ए व्यवहार समकित छे. अंतःतत्त्व एटले पूर्णस्वरूप शुद्ध जीव वस्तु अने बहिःतत्त्व एटले पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध अने मोक्ष ए बे भेदोवाळा तत्त्वो-एनी श्रद्धा ए व्यवहार समकित छे. व्यवहार समकित एटले ज राग, विकल्प. व्यवहार समकित ए रागनी पर्याय छे, शुद्ध समकित छे ज नहीं. ए तो आरोपथी (समकित) छे निश्चय वीतरागी पर्याय ते निश्चय समकित, अने श्रद्धानो विकल्प-राग ते व्यवहार समकित छे.
‘इति’ आ रीते ‘चिरम् नवतत्त्वच्छन्नम् इदम् आत्मज्योतिः’ अनादिकाळथी नवतत्त्वमां छुपायेली आ आत्मज्योति -जोयुं? नवना भेदनी रुचिमां आखो ज्ञायकभाव चैतन्यज्योतिस्वरूप अनंतकाळथी ढंकाई गयो छे. पर्यायबुद्धि वडे जेने पर्यायनी ज हयातीनो स्वीकार छे एने निज त्रिकाळी शुद्धात्मानो नकार छे, तेने शुद्धात्मा अनादिथी