ज्ञायकभाव द्रष्टिमां आवतां निमित्तनुं लक्ष छूटी गयुं, अने निमित्तथी थता भावोनुं पण लक्ष छूटी गयुं. एटले एकलो ज्ञायकभाव नजरमां आवतां नवभेद बधा जूठा छे. अंतरमां भगवान ज्ञायकभाव ध्रुव चैतन्यघनने जोतां निमित्त-नैमित्तिकभाव रहेता नथी, कारण के आ बाजु अंतरमां जोतां निमित्त रहेतुं नथी. (निमित्तनुं लक्ष छूटी जाय छे) अने निमित्तनी अपेक्षावाळा भाव पण थता नथी. वस्तु वस्तुमां रही जाय छे. पुण्य, पाप, आस्रव, बंध ए जीवनी पर्यायमां थता नैमित्तिक भाव छे, एमां निमित्त-कर्मना सद्भावनी अपेक्षा आवे छे. अने संवर, निर्जरा अने मोक्ष ए नैमित्तिकभावमां निमित्तकर्मना अभावनी अपेक्षा आवे छे. हवे सहज आत्मस्वरूप पूर्णानंदनो नाथ जे भगवान आत्मा एने जोतां आ नवभेद देखाता नथी, रहेता नथी, एटले निमित्त-नैमित्तिकभाव मटी जाय छे. त्यारे जीव-पुद्गल जुदां जुदां होवाथी बीजी कोई वस्तु सिद्ध थई शकती नथी. पुद्गल पुद्गलरूपे अने ज्ञायक ज्ञायकरूपे भिन्न भिन्न थई जाय छे.
नवने जोनारी भेदद्रष्टि एतो अनादिनी मिथ्याद्रष्टि छे. पर्यायना भेदनी रुचिमां तो आखुं द्रव्य ढंकाई गयुं छे. हवे भेद परथी नजर हठावी, एक त्रिकाळी ज्ञायकभावने जोतां जीव-पुद्गलना संबंधे जे भेदवाळी पर्याय हती ए रहेती नथी, केमके ज्ञायक ध्रुव चैतन्यप्रकाशनी द्रष्टि करतां निमित्त-नैमित्तिकभावनो अभाव थई जाय छे. एकला ज्ञायकने जोतां चैतन्यस्वरूप जे रागनी रुचिमां ढंकाई गयुं हतुं ते प्रगट थाय छे. एनुं नाम सम्यग्दर्शन छे. नवमांथी एकलो जाणक, जाणक, जाणक- एवा ध्रुव स्वभावने भिन्न तारवी अनुभववो ए सम्यग्दर्शन छे. आ सिवाय लाखो करोडो रूपिया खर्चे अने मंदिरो बनावे, देवशास्त्रगुरुने बहारथी माने के नवतत्त्वने भेदरूप माने-ए बधुं थोथेथोथां छे, सम्यग्दर्शन नथी.
कळशटीकामां तो त्यां सुधी कह्युं छे के-‘नवतत्त्वरूप वस्तुनो अनुभव मिथ्यात्व छे.’ नवतत्त्वरूपे तो आत्मा अनादिथी परिणम्यो छे. अनादिथी मिथ्याद्रष्टि जीवने संवर, निर्जरा, मोक्ष साचां नथी. अपेक्षित संवर, निर्जरा, मोक्ष कह्या छे. मिथ्यात्वमां पण अमुक प्रकृतिओ बंधाती नथी ए अपेक्षाए अबंध गण्यो छे. तथा जेटले अंशे आस्रव आदिनी बीजी प्रकृतिओ आवती नथी ए अपेक्षाए संवर गण्यो छे. संवर एटले साचो संवर एम नहीं.
आवा नवतत्त्वरूप वस्तुने अनुभवतां मिथ्यात्व छे; माटे शुद्धनयथी जीवने जाणवाथी ज सम्यग्दर्शननी प्राप्ति छे. ल्यो, आ एकांत कह्युं. ए सम्यक् एकांत छे, सम्यक् एकांत. अंतरमां ढळे छे त्यारे एने अनेकांतनुं साचुं ज्ञान थाय छे. नवतत्त्वोमांथी एक ज्ञायक