वधघट नथी, ओछुं-अधिक नथी एवो एकरूप छे. पर्याय छे ए तो भिन्नभिन्न योग्यताथी थाय छे, स्वभाव एकसद्रश, नित्य, ध्रुव रहे छे. आवा चित्सामान्य अभेद एकरूप स्वभावनी समीप जईने अनुभव करवामां आवतां ते नवतत्त्वो अभूतार्थ छे, जूठा छे. व्यवहारनये नव साचा छे, पण स्वभावना अनुभवनी द्रष्टिमां नवे असत्यार्थ छे. आवो सम्यक् अनेकांतमार्ग छे, भाई. एक अपेक्षाए व्यवहारनयथी नवतत्त्वो साचां कह्यां, तो एक अपेक्षाए त्रिकाळ ध्रुव द्रव्यनी द्रष्टिमां ते जणातां नथी, अनुभवातां नथी तेथी असत्यार्थ जूठां कह्यां. ज्यां जे अपेक्षा होय त्यां ते अपेक्षा बराबर जाणवी जोईए.
तेथी आ नवतत्त्वोमां भूतार्थनयथी एक जीव ज प्रकाशमान छे. नवतत्त्वोमां सत्द्रष्टिथी-द्रव्यद्रष्टिथी जोतां ज्ञायक, ज्ञायक, ज्ञायक, एक जीव ज प्रकाशमान छे. एम ते एकपणे प्रकाशतो शुद्धनयपणे अनुभवाय छे. ए एकपणानो अनुभव थतां आत्मा त्रिकाळ ‘शुद्ध’ आवो छे एम आत्म-प्रसिद्धि थाय छे. त्यारे जे आ अनुभूति थई ते आत्मख्याति ज छे अने आत्मख्याति ते सम्यग्दर्शन ज छे. आ रीते सर्व कथन निर्दोष ज छे, बाधा रहित छे. अहाहा! आ एकरूप चैतन्यघनस्वभावनी अनुभूति ते आत्मख्याति आत्मानी ओळखाण, अने आत्मख्याति ते सम्यग्दर्शन ज छे.
आ नवतत्त्वोमां, शुद्धनयथी जोईए तो, जीव ज एक चैतन्य-चमत्कारमात्र प्रकाशरूप प्रगट थई रह्यो छे. अहाहा! पर्यायमां नवतत्त्वोना भेदरूप परिणमन होवा छतां, जेमां वस्तुनी स्थिति प्रकाशमान छे एवा शुद्धनयथी जोतां एकलो ज्ञायक, ज्ञायक, ज्ञायक, शुद्ध प्रत्यक्ष छे, नवतत्त्वो कांई जुदां जुदां देखातां नथी.
ज्यां सुधी आ रीते एटले शुद्धनयनी द्रष्टि वडे जीवतत्त्वनुं जाणपणुं नथी त्यां सुधी ते व्यवहारद्रष्टि छे. मात्र पर्यायने, भेदने ज माने ए भेदद्रष्टि-व्यवहारद्रष्टि छे. ते आ जीव छे, पर्याय छे, आस्रव छे, पुण्य छे ईत्यादि जुदां जुदां नवतत्त्वने ज माने छे तेथी मिथ्याद्रष्टि छे. जीव-पुद्गलना बंधरूप अवस्थाद्रष्टिथी जोतां आ पदार्थो जुदा जुदा देखाय छे. अर्थात् पर्यायद्रष्टिथी जोतां आ जीव छे, पुण्य छे, पाप छे एम भिन्न भिन्न देखाय छे. पण ज्यारे शुद्धनयथी जीव-पुद्गलनुं निजस्वरूप-एटले के एक ज्ञायक आत्मानुं शुद्ध स्वरूप अने एकला पुद्गलनुं भिन्न स्वरूप-एम निजस्वरूप भिन्न भिन्न जोवामां आवे त्यारे ए पुण्य, पाप आदि नवतत्त्व कांई वस्तु नथी; केमके एकलो ज्ञायकभाव भिन्न अने पुद्गल पण भिन्न एम जोतां ए नव त्यां देखाता नथी.