Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भाग-१ ] १९७

अनुभव करतां आ नवतत्त्वो साचां छे. पर्यायबुद्धिथी जोतां भूतार्थ छे. व्यवहारनये नवतत्त्वो छे; पण ए सम्यग्दर्शननो विषय नथी. वेदांत कहे छे पर्याय नथी, तो एम नथी. नवना भेदनी पर्याय छे. व्यवहारनये, पर्यायबुद्धि करीने एनी सन्मुख जोई एकपणे अनुभव करतां नवतत्त्वो भूतार्थ छे, रागनी पर्याय अने निमित्तनी पर्याय बन्नेने एकपणे अनुभवतां नवतत्त्वना भेदो सत्यार्थ छे.

अने एक जीवद्रव्यना स्वभावनी समीप जईने एटले के एक ज्ञायकमात्र द्रव्यस्वभावनो आश्रय लईने अर्थात् ते एकने एकपणे अनुभव करतां ते नवतत्त्वो अभूतार्थ छे, जीवना एकाकार स्वरूपमां ए नवतत्त्वो नथी. एकरूप अभेद ज्ञायकभाव, एकाकार सच्चिदानंदस्वभावमां अनेक प्रकारना भेदो नथी. अहो! आ तो शब्दे शब्द मंत्र छे. आ धर्म केम थाय एनी वात चाले छे. आ व्यवहारनये नव छे एनुं तात्पर्य शुं? के ए नवनुं लक्ष छोडीने एक स्वभावनुं लक्ष करवुं ए तात्पर्य छे. ए नवना लक्षे धर्म न थाय, पण राग अने अधर्म थाय अने अखंड एक त्रिकाळी ज्ञायकना आश्रये अर्थात् ते एकने एकपणे अनुभवतां सम्यग्दर्शन थाय, धर्म थाय.

भगवान आत्मा, एकलो चैतन्य जे पर्यायनी आडमां, नवतत्त्वनी आडमां दूर हतो ते एकज्ञायक भावनी समीप जईने ते एकने एकपणे अनुभवतां तेमां नवभेदो जणाता नथी तेथी ते नव अभूतार्थ छे. तेथी आ नवतत्त्वोमां भूतार्थनयथी जोतां एक जीव ज प्रकाशमान छे, एक ज्ञायकभाव ज प्रकाशमान छे.

एवी रीते अंतर्द्रष्टिथी जोईए तोः- ज्ञायकभाव जीव छे अने जीवना विकारनो हेतु अजीव छे. विकार एटले विशेष कार्य- जीवनी पर्याय. अहीं विकार एटले दोष एम अर्थ नथी, पण विशेष कार्य एम समजवुं. वळी पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध अने मोक्ष -ए जेमनां लक्षण छे एवा तो केवळ जीवना विकारो छे, जीवनी पर्यायो छे. अने पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बंध अने मोक्ष-ए विकारहेतुओ केवळ अजीव छे. आवा आ नवतत्त्वो एटले जीवना विकारो जेना अजीव-हेतुओ, छे ए नवतत्त्वो, जीवद्रव्यना स्वभावने छोडीने, पोते अने पर जेमनां कारण छे-पोते उपादान कारण अने पर निमित्त कारण छे-एवा एक द्रव्यना पर्यायोपणे अनुभव करवामां आवतां भूतार्थ छे. पर्यायो पर्यायअपेक्षाए छे. व्यवहारनय छे. व्यवहारनयनो विषय पर्यायो छे. ए जाणवा लायक छे, पण आश्रय करवा योग्य नथी.

जीवद्रव्यनो स्वभाव सर्वकाळे अस्खलित छे. पर्याय छे ए तो बदलतो - पलटतो प्रवाह छे. त्रिकाळी ज्ञायक चैतन्य छे ए तो त्रिकाळ ध्रुव, ध्रुव, ध्रुव अस्खलित जेमां