समयसार गाथा-२०४ ] [ १८७
‘साक्षात्’ केम कह्युं? वस्तु तो पोते मोक्षस्वरूप ज छे. तेनुं सामर्थ्य-तेनी शक्ति- तेनुं सत्त्व सदा मुक्तस्वरूप ज छे. पण आ तो पर्यायमां मुक्ति थाय छे-अनुभवाय छे तेनी वात छे. भगवान आत्मा अबद्धस्पृष्ट छे एम गाथा १४-१प मां आवे छे ने? अहा! जेणे आत्माने अबद्धस्पृष्ट जाण्यो तेणे जैनशासन जाण्युं छे. भगवान आत्माने राग ने कर्मना बंधथी रहित जाणनारी जे शुद्धोपयोगनी परिणति छे ते जैनशासन छे. अशुद्धोपयोगनी-रागनी परिणति कांई जैनशासन नथी. जेणे, हुं मुक्तस्वरूप ज छुं-एम अनुभव्युं तेणे चारे अनुयोगना साररूप जैनशासन जाणी लीधुं. चारे अनुयोगनो सार वीतरागता छे अने ते वीतरागस्वरूपी-मुक्तस्वरूपी एवा भगवान आत्मानो आश्रय ले तो प्रगट थाय छे. आवो मार्ग छे!
प्रश्नः– श्री समयसारजीमां निश्चयनी वात छे, ज्यारे मोक्षशास्त्र (तत्त्वार्थसूत्र)मां व्यवहारनी वात छे. परंतु ए बन्ने साथे जोईए ने?
समाधानः– भाई! बन्ने साथे जोईए एटले शुं? एटले के बन्नेनुं ज्ञान साथे जोईए-होय छे. परंतु निश्चयथी पण (धर्म) थाय अने व्यवहारथी पण थाय एम अर्थ नथी. बन्नेनुं ज्ञान साथे होय छे अने ते ज्ञान पण स्वनो आश्रय थतां यथार्थ थइ जाय छे. अहाहा....! अबद्धस्पृष्ट प्रभु आत्माने ज्यां जाण्यो त्यां, राग जे बाकी रहे छे तेनुं ज्ञान पण थई जाय छे. तेना माटे बीजुं ज्ञान करवुं पडे छे एम नथी. आवी वात छे भाई!
अहीं कहे छे-समस्त कर्मनो अभाव थवाथी साक्षात् मोक्ष थाय छे. एटले शुं? के आत्मा शक्तिस्वरूपे-स्वभावरूपे-सामर्थ्यरूपे तो मुक्त ज छे; पण आ तो पर्यायमां मुक्त थाय छे-अनुभवाय छे त्यारे साक्षात् मोक्ष थाय छे एम कह्युं छे. श्रीमद् राजचंद्रजीए कह्युं छे के-‘दिगंबरना आचार्ये एम स्वीकार्युं छे के-जीवनो मोक्ष थतो नथी, परंतु मोक्ष समजाय छे.’ राग ते हुं-एम जे मान्युं हतुं ते मान्यता छूटी गई तेने मोक्ष कहे छे. अहा! रागमां आत्मा नथी अने आत्माने रागनो बंध के संबंध पण नथी एवा स्वस्वरूपनी पर्यायमां प्राप्ति थवी ते साक्षात् मोक्ष छे.
भाई! जन्म-मरणना फेरा, ८४ नुं भवचक्र जेने टाळवुं होय तेने माटे मारग आ छे. शास्त्रमां लखाण छे के माताना उदरमां मनुष्यपणे १२ वर्ष वधारेमां वधारे रहे. सवानव महिना तो साधारण-सामान्य कायस्थिति छे, पण कोई तो १२ वर्ष सुधी रहे छे. अरे! उंधा माथे कफमां, लोहीमां ने एंठामां बार बार वर्ष भाई! तुं रह्यो छो! ए दुःखनी शी वात! अने अहीं जरीक कांईक थाय त्यां...? बापु! आवां जन्म-मरणनां दुःख टाळवां होय तो आ उपाय छे. जेमां जन्म-मरण नथी, जन्म-मरणना भाव नथी एवी परिपूर्ण ज्ञान अने आनंदथी भरेली पोतानी चीज