१८८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७ छे तेनी ओथे जा, तेनो आश्रय कर; भाई! भव टळीने तारो मोक्ष थशे, तने पूर्ण आनंद थशे. अहो! आवुं ज्ञानना अवलंबननुं अचिंत्य माहात्म्य छे!
पद्मनंदी पंचविंशतिमां कह्युं छे के आ चैतन्यस्वरूपनी वार्ता पण जेणे प्रसन्न चित्ते सांभळी छे ते भावि मोक्षनुं भाजन छे. मोक्षनुं भाजन छे एटले के तेनो मोक्ष थशे ज, अल्पकाळमां थशे. प्रसन्न चित्ते एटले अंतरमां महिमा लावी अत्यंत आल्हादथी भगवान चैतन्यस्वरूप, अबंधस्वरूप आत्मानी वार्ता पण जेणे सांभळी छे ते मोक्षनुं पात्र थशे. जेमणे व्यवहारने बंधनुं कारण कह्युं छे ते दिगंबर संत पद्मनंदी मुनिराज आम कहे छे के अबंधस्वरूपनी वात पण प्रसन्न चित्ते सांभळनार अबंध दशाने-मोक्ष दशाने पामशे.
तो शुं अबद्धस्पृष्टनी वार्ता सांभळी छे तेने समकित छे के ते मोक्षनुं भाजन छे? अरे भाई! जेने स्वरूपनो महिमा जाग्यो अने प्रसन्न चित्ते तेना स्वरूपने सांभळ्युं तेने ‘हुं अबद्ध छुं’ एवो निर्णय थयो छे. भले ते विकल्परूप हो, पण ‘आ हुं छुं’ एम स्वरूपनो पक्ष करनारने रागनो-व्यवहारनो पक्ष छूटी जाय छे अने तेथी ते स्वरूपनो आश्रय करी अल्पकाळमां मुक्तिने पात्र थई जाय छे. अहाहा...! जेणे चित्चमत्कारस्वरूप भगवान आत्माना अपरिमित सामर्थ्यनी वात उल्लसित वीर्यथी सांभळी छे तेने ‘हुं अबंध छुं, मुक्तस्वरूप छुं, आनंदनुं धाम छुं’-एम अंतरमां पक्ष- प्रेम थयो छे अने तेथी ते रागथी भिन्न पडीने भाविमां स्वरूपनो आश्रय लई अवश्य मुक्तिने पात्र थई जशे. जुओ! आ स्वरूपनी वार्ता सांभळवानो महिमा! स्वरूपना आश्रयनुं तो कहेवुं ज शुं?
अही दश बोलथी कहे छे- १. ज्ञाननुं ज एकनुं आलंबन करवुं, केमके २. तेना आलंबनथी ज निजपदनी प्राप्ति थाय छे, ३. ते वडे भ्रान्तिनो नाश थाय छे, ४. भ्रान्तिनो नाश थतां आत्मानो लाभ थाय छे, प. ते वडे अनात्मानो परिहार सिद्ध थाय छे, अने ६. तेनाथी कर्म जोरावर थई शकतुं नथी, तथा ७. राग-द्वेष-मोह उत्पन्न थता नथी, ८. तेनाथी कर्म आस्रवतुं नथी, नवुं कर्म बंधातुं नथी, ९. पूर्वनां बंधायेलां कर्म निर्जरी जाय छे तथा १०. समस्त कर्मनो अभाव थतां साक्षात् मोक्ष थाय छे.