Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-२०४ ] [ १८९

अहा! आ दस बोल लीधा छे.
* गाथा २०४ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘कर्मना क्षयोपशम अनुसार ज्ञानमां जे भेदो थया छे ते कांई ज्ञानसामान्यने अज्ञानरूप नथी करता, उलटा ज्ञानने प्रगट करे छे.’

जुओ, शुं कहे छे? के कर्मना क्षयोपशम अनुसार एटले के कर्मना विघटनने अनुसरीने जे ज्ञानमां मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान आदि विशेषो-भेदो पडे छे ते ज्ञानसामान्यने अज्ञानरूप नथी करता, उलटुं ज्ञानने ज प्रगट करे छे, सामान्यज्ञाननी ज तेओ पुष्टि करे छे. अहीं निर्मळ ज्ञानना भेदो जे प्रगट थया ते कर्मना क्षयोपशम अनुसार थया छे एम कह्युं ए तो निमित्तथी कथन छे, बाकी ते भेदो पोतानी एवी क्षयोपशम-योग्यताथी ज प्रगट थया छे. कहे छे-ज्ञानना आ भेदो ज्ञानसामान्यने ज प्रगट करे छे.

‘माटे भेदोने गौण करी एक ज्ञानसामान्यनुं आलंबन लई आत्मानुं ध्यान धरवुं; तेनाथी सर्व सिद्धि थाय छे.’

जुओ, भेदोने गौण करी... एम कह्युं ने? मतलब के भेदो छे, ते भेदो छे ज नहि एम नथी. परंतु तेमने गौण करी अर्थात् तेमनुं लक्ष छोडी दई निश्चय वस्तु सामान्य छे तेने लक्षमां लई अर्थात् ज्ञानसामान्यनुं आलंबन लई आत्मानुं ध्यान धरवुं एम कहे छे. ल्यो, आ करवानुं छे, केमके तेनाथी सर्व सिद्धि थाय छे. अहीं व्रतादि करवानी वात ज नथी. अहीं तो भगवान आत्माने ध्याननो विषय बनावी-ध्यानमां आत्माने ध्येय बनावी-तेनुं ध्यान करतां सर्व सिद्धि थाय छे एम कहे छे; अर्थात् तेना ध्यानथी क्रमे संवर, निर्जरा ने मोक्षनी प्राप्ति अने आस्रव-बंधना अभावनी सिद्धि थाय छे. आवो मार्ग छे!

हवे आ अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः-

* कळश १४१ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘निष्पीत–अखिल–भाव–मण्डल–रस–प्राग्भार–मत्ताः इव’ पी जवामां आवेलो जे समस्त पदार्थोना समूहरूपी रस तेनी अतिशयताथी जाणे के मत्त थई गई होय एवी...

शुं कह्युं आ? के निर्मळ ज्ञाननी पर्याय समस्त पदार्थोना समूहरूपी रसने पी बेठी छे अने तेने अतिशयताथी जाणे के मत्त थई गई छे. अर्थात् श्रुतज्ञाननी पर्याय पण त्रणकाळ-त्रणलोकने जाणे छे अने तेथी जाणे मत्त थई छे. आवुं एनुं ज्ञानसामर्थ्य छे छतां अरे! अज्ञानीए एने दया, दान आदि रागमां वेची दीधो छे!