Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१९० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७

प्रश्नः– पण दया तो पाळवी जोईए ने? समाधानः– कई दया बापु? परनी दया उपर लक्ष जाय त्यां तो राग थाय छे अने राग तारुं स्वरूप नथी; धर्मनुंय राग स्वरूप नथी भाई! परनी दया हुं पाळी शकुं छुं एवी मान्यतानो भाव तो मिथ्यात्व छे केमके परनी दया जीव करी शकतो ज नथी. भगवान! सांभळने भाई! तारी दया-स्वदया ते अहिंसा धर्म छे, ज्यारे आ परनी दयानो भाव तो रागमय छे अने एने तो भगवान वास्तवमां हिंसा कहे छे. (जुओ पुरुषार्थसिद्धयुपाय छंड ४४). लोकोने आ आकरुं लागे छे, पण शुं थाय? (ज्यां स्वरूप ज आवुं छे त्यां?)

प्रश्नः– पण सिद्धांतमां दयाने धर्म कह्यो छे? समाधानः– हा, पण भाई! ते कई दया? बापु! ए स्वदयानी-वीतरागी परिणामनी वात छे. जेम बीजा जीवने मारी नाखवानो भाव एटले के टकता तत्त्वनो ईन्कार करवो ते हिंसा छे, तेम भाई! जेवडुं तारुं स्वरूप छे-जे तारुं टकतुं पूर्ण तत्त्व छे- तेनो ईन्कार करवो ते पण हिंसा छे. हुं आवडो (पूर्ण) नहि, पण हुं रागवाळो, पर्यायवाळो ने रागथी-व्यवहारथी प्राप्त थाउ तेवो छुं-एम जेणे पोतानुं जेवडुं स्वरूप छे तेवडुं मान्युं नथी तेणे पोतानी हिंसा करी छे. भाई! स्वस्वरूपनो स्वीकार करी तेमां ज अंतर्निमग्न थवुं ते स्वदया छे अने ते धर्म छे. सिद्धांतमां स्वदयाने धर्म कह्यो छे. (पर दयाने धर्म कहेवो ए तो उपचार छे).

जुओ, निर्मळानंदनो नाथ प्रभु आत्मा अति निर्मळ छे. अहीं कहे छे-तेना आश्रये प्रगट थयेली निर्मळ पर्याय जाणे मत्त थई गई छे. केम? तो कहे छे के ते समस्त पदार्थोना समूहरूपी रसने पी बेठी छे. एटले शुं? के अनंता पदार्थोने जाणवानो पोतानी पर्यायमां जे रस छे ते रसनी अतिशयता वडे जाणे ते मत्त थई गई छे. अहाहा...! ज्ञाननी वर्तमान पर्याय वडे त्रिकाळी ज्ञायकने जाणवामां आवतां ते पर्याय बीजा अनंत द्रव्य-गुण-पर्यायने पण जाणे छे अने तेथी जाणे हवे बधुं ज जाणी लीधुं, हवे कांई ज जाणवुं बाकी नथी-एम मत्त थई गई छे. समजाणुं कांई...? अहा! जेणे एकने (शुद्ध ज्ञायकने) जाण्यो तेणे पर्यायमां बधुं जाण्युं. आवी व्याख्या अने आवो धर्म!

प्रश्नः– शुं जात्रा करवी, परनी दया पाळवी, व्रत करवां, उपवास करवा इत्यादि धर्म नथी?

समाधानः– ना, ते धर्म नथी. केम? केमके बापु! ए तो बधा रागना-शुभरागना अनेक प्रकार छे. धर्म तो एक वीतरागभावमात्र छे. शुद्ध चैतन्यस्वभावी प्रभु आत्मामां एकाग्र थवाथी जे निर्मळ निर्विकार वीतरागी परिणति-पर्याय प्रगट