समयसार गाथा-२०४ ] [ १९१ थाय ते अहिंसा धर्म छे अने ते ज सत्य, ब्रह्मचर्य अने अपरिग्रहरूप धर्मनो परिणाम छे. आवी वात छे.
अहा! कहे छे-ज्ञाननी निर्मळ पर्याय जाणे मत्त थई गई छे. भाई! ज्यां आत्मानी ज्ञानपर्यायमां पोतानुं शुद्ध त्रिकाळी परिपूर्ण स्वरूप जणायुं तो ते पर्यायमां विश्वना जेटला पदार्थो छे ते बधायनुं ज्ञान पण समाई जाय छे. अहाहा...! निर्मळ ज्ञाननी पर्याय ज्ञानरसनी अतिशयता वडे स्वने अने परने पीने-जाणीने जाणे मत्त थई गई छे. एम के हवे शुं जाणवानुं बाकी छे? झीणी वात छे प्रभु! आत्मा सर्वज्ञस्वभावी प्रभु छे; तेनी ज्यां अंतर्द्रष्टि थई त्यां ज्ञाननी पर्यायमां आखो त्रिकाळी भगवान ज्ञाननो सूर्य प्रभु आत्मा जणायो अने ते पर्यायमां जगतना समस्त पदार्थोनुं ज्ञान पण समाई गयुं; जाणे के ते पर्याय स्व अने परने-समस्त पदार्थोने ज्ञानमां पी बेठी न होय! अहाहाहा...! श्रुतज्ञाननी पर्याय पण पोताना स्वपरप्रकाशकपणाना सामर्थ्य वडे स्व-परने-समस्त पदार्थोने पीने-जाणीने जाणे मत्त थई गई छे. आवी वात अज्ञानीने बेसती नथी. न ज बेसे ने? केमके शुद्ध चैतन्यस्वरूपी भगवान आत्मानां द्रष्टि अने अनुभव विना पोते जे कांई आचरण करे छे ते चारित्र छे एम एने मनाववुं छे. परंतु भाई! ए कांई तने लाभनुं कारण नथी.
प्रश्नः– चारित्र छे ते धर्म छे; आप एकान्त केम करो छो? समाधानः– चारित्र छे ते धर्म छे-ए तो यथार्थ छे. परंतु तेनुं मूळ तो सम्यग्दर्शन छे. माटे विना सम्यग्दर्शन चारित्र-आचरण आव्युं कयांथी? भाई! सम्यग्दर्शन विनानां जेटलां व्रत, तप वगेरे आचरण छे तेने तो भगवाने बाळव्रत ने बाळतप कह्यां छे. अने ज्ञानीने पण जे रागनुं आचरण छे ते चारित्र कयां छे? एने स्वरूपमां जे रमणता थाय ए चारित्र छे. आवुं लोकोने आकरुं पडे एटले खळभळी ऊठे छे. पण शुं थाय?
अहीं तो कहे छे के-सम्यग्ज्ञाननी-श्रुतज्ञाननी पर्याय हो तोपण तेमां स्वस्वरूप जे त्रिकाळी पूर्ण छे तेनुं ज्ञान थाय छे अने तेमां जगतना जेटला द्रव्य-गुण-पर्याय छे ते बधानुं पण ज्ञान थाय छे; अर्थात् ते ज्ञान बधाने पी गयुं छे. पी गयुं छे एटले? एटले के ए ज्ञाननुं एवुं सामर्थ्य छे के छे एनाथी अनेकगणुं विश्व होय तोपण तेने ते जाणी ले. अहो! सम्यग्ज्ञाननुं कोई अचिंत्य सामर्थ्य छे! अहा! जेने पोतानी सर्वज्ञशक्तिनुं-परमात्मशक्तिनुं अंतरमां भान थयुं तेनी ज्ञान-पर्यायनुं अद्भुत चमत्कारी सामर्थ्य छे के ते जगतना समस्त स्व-पर पदार्थोने-द्रव्य-गुण-पर्यायने पी ले छे, जाणी ले छे. आवी वात छे.