Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१९२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७

प्रश्नः– पण लोको आवी वातथी राड पाडे छे ने? उत्तरः– शुं करीए भाई! तेओ तो पोतानी (वर्तमान) योग्यता प्रमाणे एम करे छे अने तेमने जे भास्युं होय ते कहे छे. पण एथी कांई तेमनो तिरस्कार न होय. ते पण भगवान छे ने अंदर? १७-१८ गाथामां आवे छे ने के ज्ञाननी वर्तमान जे व्यक्त अवस्था छे ते अवस्थानुं स्वरूप ज एवुं छे के तेमां आखुं द्रव्य ज्ञेय तरीके जणाय ज छे. अज्ञानीनी पर्यायमां पण आखो ज्ञायक जणाय छे पण तेनी अंदर ज्ञायक उपर द्रष्टि नथी, द्रष्टि बहार छे तेथी ते बीजो अध्यवसाय करे छे के-हुं राग छुं, अल्पज्ञ छुं, पर्यायमय छुं. हवे त्यां शुं करीए? (द्रष्टि बदलातां बधुं सुलटी जशे)

अहीं कहे छे-अनंत द्रव्य-गुण-पर्यायोना समूहने जे पी गई छे एवी ‘यस्य इमाः अच्छ–अच्छाः संवेदनव्यक्तयः’ जेनी आ निर्मळथी पण निर्मळ संवेदन-व्यक्तिओ ‘यद् स्वयं उच्छलन्ति’ आपोआप उछळे छे,...

शुं कह्युं? के निर्मळथी पण निर्मळ संवेदनव्यक्तिओ आपोआप उछळे छे एटले के शुद्ध चैतन्यस्वभावना आश्रये स्वयं प्रगट थाय छे. जुओ, परना आश्रये तो मलिनतानी पर्यायो प्रगट थाय छे. चाहे तो देव-गुरु-शास्त्रना आश्रये (लक्षे) पर्याय थाय तोपण ते मलिन ज छे केमके तेओ परद्रव्य छे अने परद्रव्यना आश्रये राग ज थाय छे. परंतु स्वद्रव्यनो आश्रय लेतां निर्मळथी पण निर्मळ एटले अति अति निर्मळ अर्थात् वधती- वधती निर्मळ पर्यायो प्रगट थाय छे. आवी वात बिचारो सांभळवा नवरो कयारे थाय? धंधो-वेपार ने स्त्री-पुत्र-परिवारने साचववानी पापनी मजुरी आडे एने नवराश कयां मळे? हुं कर्ता-हर्ता छुं, ने आवो छुं ने तेवो छुं-एम मान लेवा आडे नवरो थाय तो आ सांभळे ने?

अरे! अज्ञानी अनंतकाळमां आम ने आम मरी गयो छे. अहा! एणे जीवने मारी नाख्यो छे! पोते चैतन्यरत्नोनो समुद्र होवा छतां परथी पोतानी मोटप बताववामां एणे जीवता जीवने मारी नाख्यो छे, एटले के पर्यायमां तेनो (पोतानो) ईन्कार कर्यो छे. बाकी वस्तु जे छेपणे छे ते कयां जाय? श्रीमद् राजचंद्रे कह्युं छे ने के-

“सुख प्राप्त करतां सुख टळे छे लेश ए लक्षे लहो,
क्षण क्षण भयंकर भावमरणे, कां अहो! राची रहो?”
-अमूल्य तत्त्वविचार.

अहा! राग वडे अने पर चीज वडे हुं मोटो-अधिक छुं एम माननार क्षणेक्षणे जीवनुं भावमरण करे छे.