Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-२०४ ] [ १९३

अहीं कहे छे-पूर्णानंदनो नाथ शुद्ध चैतन्यस्वरूप भगवान आत्मानो आश्रय थतां निर्मळथी निर्मळ ज्ञानपर्यायो आपो आप ऊछळे छे अर्थात् प्रगट थाय छे. निर्मळथी निर्मळ एटले ज्ञान निर्मळ-अतिनिर्मळ-एम निर्मळ निर्मळ वधतुं ज जाय छे. शास्त्रज्ञान के उघाडज्ञान वधतुं जाय छे एम नहि पण आत्मज्ञान (वीतरागविज्ञान) वधतुं जाय छे, द्रढ थतुं जाय छे एम कहे छे.

आत्मज्ञाननो अर्थ शुं छे? आत्मज्ञान एटले पर्यायनुं ज्ञान एम नहि, परंतु त्रिकाळी द्रव्यनुं जेमां ज्ञान थाय ते आत्मज्ञान छे. जोके ज्ञान पोते छे तो पर्याय, पण ज्ञान कोनुं? के त्रिकाळी द्रव्यस्वरूप आत्मानुं.

अहाहाहा...! आत्मा पूर्णानंदनो नाथ प्रभु छे, के जेमां अनंत आनंद, अनंत ज्ञान, अनंत बळ, अनंत शांति, अनंत स्वच्छता, अनंत प्रभुता, अनंत प्रकाश ने एवी एवी अनंत शक्तिओ छे. तथा ते एक एक शक्ति अनंत स्वभावे विराजे छे. त्यां कोई एक गुणने बीजा गुणनी सहाय नथी. छतां एक एक गुणमां बीजा अनंता गुणनुं रूप छे.

ए शुं कह्युं? के ज्ञानगुण छे तेमां अस्तित्वगुणनुं रूप छे. जे अस्तित्वगुण छे ते ज्ञानगुणमां नथी, परंतु ज्ञान ‘छे’-एवुं जे अस्तित्व ज्ञानगुणमां छे ते अस्तित्व गुणनुं रूप छे. तेवी रीते ज्ञानगुणमां प्रभुता के इश्वर नामनो गुण नथी केमके ते तो बीजो गुण छे परंतु ते ज्ञानगुणमां इश्वर गुणनुं ने प्रभुता गुणनुं रूप छे, केमके ज्ञान इश्वरस्वरूप छे, प्रभुस्वरूप छे. अहाहा...! जेनो जे स्वभाव छे तेनी तेमां मर्यादा शी होय?

अरे भाई! तने खबर नथी. भगवान आत्मा पोते परिपूर्ण प्रभु छे. ते एक एक गुणे परिपूर्ण छे. छतां एक एक गुण भिन्न भिन्न छे. एक गुणने बीजा गुणनी सहाय नथी. एक गुण बीजा गुणने निमित्त हो, पण निमित्त शुं करे? ते उपादानमां जतुं नथी. अर्थात् एक गुण बीजा गुणनुं कांई करतो नथी छतां दरेक गुणनुं रूप बीजा बधा गुणमां छे. ज्ञान ‘छे’-एम ज्ञाननुं अस्तित्व पोताथी छे, ज्ञाननुं वस्तुत्व पोताथी छे, ज्ञान पोताथी कर्ता छे. आम अस्तित्व, वस्तुत्व, कर्ता गुण तो भिन्न भिन्न छे पण ज्ञानमां तेमनुं रूप छे. आम अनंत गुणमां प्रत्येकमां अनंत गुणनुं रूप छे. अहो! आवो अनंत गुणसमुद्र प्रभु आत्मा छे. तेनुं जेणे अंतर्मुख थईने ज्ञान कर्युं छे ते बधाने पी गयो छे एम कहे छे.