१९४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७
अंतर्मुख थतां आत्मानुं ज्ञान थाय छे केमके वस्तु-आत्मा अंतर्मुख छे, बहारमां नथी. बहारमां तो पर्याय ने राग छे. तेथी ज्ञाननी पर्यायने अंतरमां वाळीने अनंतगुणना पिंडस्वरूप सर्वज्ञस्वभावी आत्मामां जे एकाग्र थाय छे तेने आत्मज्ञान थाय छे.
ज्ञानगुणमां सर्वज्ञस्वभावनुं रूप छे. सर्वज्ञशक्ति भिन्न छे, पण ज्ञानगुणमां सर्वज्ञशक्तिनुं रूप छे. तेवी रीते ज्ञानगुणमां आनंदस्वभावनुं रूप छे. आनंद गुण जुदो छे, ज्ञानगुणमां आनंद गुण नथी, पण अनंत आनंदस्वभावनुं रूप ज्ञानगुणमां छे. अहो! आवो अद्भुत निधि भगवान. चैतन्यरत्नाकर आत्मा छे! अहाहा...! जेमां अनंत-अनंत चैतन्यगुणरत्नो भर्यां छे एवा आत्मानुं भान थतां-ज्ञाननी पर्यायमां भगवान आत्मानुं ज्ञान थतां ज्ञाननी पर्याय स्वने ने परने जाणे पी जती-जाणी लेती थकी आपोआप प्रगट थाय छे अर्थात् ते निर्मळथी निर्मळ पर्यायनी स्व-परने जाणवानी शक्ति सहजपणे खीली गई होय छे एम कहे छे.
अहा! भगवान! तुं कोण छो ते (आचार्य) परमेश्वर तने ओळखावे छे. अहा! जेणे हजु पोताना परमेश्वर-भगवान आत्माना आश्रये सम्यग्दर्शन अने आत्मज्ञान प्रगट कर्युं ज नथी तेने रागनी मंदतानां आचरण-व्रत, तप आदि भले हो, पण ए बधां बाळव्रत ने बाळतप एटले के मूर्खाई भर्यां व्रत ने मूर्खाई भर्यां तप छे. भाई! तने खोटुं लागे एवुं छे पण शुं थाय? वस्तुस्थिति ज एवी छे ने! भगवाने पण एम ज कह्युं छे ने! भाई! भगवान आत्मानुं-पर्यायवान वस्तुनुं-पोतानी ज्ञाननी पर्यायमां ज्यां सुधी ज्ञान-श्रद्धान न थाय त्यां सुधी गमे तेवुं शास्त्रज्ञान हो के जगतने समजावतां आवडे तेवी बुद्धि हो तोपण ते ज्ञानने ज्ञान (आत्मज्ञान) कहेता ज नथी.
आत्मामां सर्वने जाणवाना सामर्थ्यवाळो सर्वज्ञ गुण छे. आ सर्वज्ञ गुणनुं रूप तेना अनंता गुणमां व्यापेलुं छे. अहा! आवो अनंतगुणना सत्त्वरूप जे भगवान आत्मा छे ते ज्ञायक छे. अहीं कहे छे-जेने अंदर ज्ञाननी पर्यायमां ‘हुं आवो छुं’ एवुं ज्ञान थयुं छे तेनी ज्ञाननी पर्यायमां स्वने ने परने-सर्वने, जाणे ते पी गयो होय तेम, जाणवानुं सामर्थ्य खीली ऊठयुं छे. आनुं नाम आत्मज्ञान अने आ धर्म.
भाई! तें तने कदी जोयो नथी; अंदर चैतन्यनुं निधान पडयुं छे त्यां तारी नजरुं गई नथी. बस एकला बाह्य आचरणमां ज तुं रोकाई रह्यो छो. पण एमां तने कांई लाभ नहि थाय हों. बापु! अनंतकाळथी तें खोट ज करी छे. तने ए क्रियाकांडना प्रेमथी (पर्यायमां) नुकशान ज गयुं छे. पण भाई! तारे खजाने (द्रव्यमां) खोट नथी हों; खजानो तो अनंतगुणना सत्त्वथी भरेलो त्रिकाळ भरचक छे; त्यां कांई खोट नथी. तेमां नजर कर, तुं न्याल थई जईश.