१९६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७ चैतन्यरत्नाकर छे. अहाहाहा...! जेम माता बाळकने घोडियामां उंघाडवा माटे तेनां वखाण करे छे के-‘भाई तो मारो डाह्यो...’ इत्यादि तेम आचार्य भगवान अहीं आत्माने जगाडवा माटे तेने ‘भगवान अद्भुतनिधि चैतन्यरत्नाकर’ कहीने प्रशंसे छे. प्रभु! ए तो तारां स्वरूपनां गीत संतो तने समजावे छे.
श्री परमात्म प्रकाशमां तथा समयसारना बंधाधिकारमां (गाथा २८३ थी २८प जयसेनाचार्यनी टीकामां) आवे छे के-
‘सहजशुद्धज्ञानानंदैकस्वभावोऽहं, –स्वाभाविक शुद्ध ज्ञान अने आनंद जेनो स्वभाव छे ते हुं छुं, निर्विकल्पोऽहं, उदासीनोऽहं, निरंजननिजशुद्धात्मसम्यक्श्रद्धान– ज्ञानानुष्ठानरूपनिश्चयरत्नत्रयात्मकनिर्विकल्पसमाधिसंजातवीतरागसहजानंदरूपसुखानुभूति मात्रलक्षणेन स्वसंवेदनज्ञानेन संवेद्यो गम्यः प्राप्यो भरितावस्थोऽहं।’ ल्यो, ‘भरितावस्थोऽहं’ एटले के मारो नाथ जे पूर्ण शक्तिथी भरेलो भगवान छे ते हुं छुं. तथा वीतराग सहज आनंद जेनुं लक्षण छे एवा स्वसंवेदनज्ञाननी पर्यायथी जणाउं- वेदाउं-प्राप्त थाउं तेवो हुं छुं. व्यवहारना विकल्पथी जणाउं एवो हुं नथी. अहाहाहा...! जुओ आ चैतन्यरत्नाकर प्रभु आत्मानुं स्वरूप! वळी कहे छे-हुं सर्व विभावथी रहित एवो शून्य छुं-राग–द्वेष–मोह–क्रोध–मान–माया–लोभ–पंचेंद्रियविषयव्यापार– मनोवचनकायव्यापार–भावकर्म–द्रव्यकर्म–नोकर्म–ख्याति–पूजा–लाभ–द्रष्टश्रुतानुभूत– भोगाकांक्षारूपनिदानमायामिथ्याशल्यत्रयादिसर्वविभावपरिणामरहितशून्योऽहं। जगत्त्रयेऽपि कालत्रयेऽपि मनोवचनकायैः कृतकारितानुमतैश्च शुद्धनिश्चयेन तथा सर्वे जीवाः इति निरंतरं भावना कर्तव्या। अहाहा...! त्रणे लोकमां अने त्रणे काळे, मन-वचन-काये बधा जीवो आवा छे एवी निरंतर भावना करवी एम कह्युं छुं.
भाई! तुं कोण छो? तो कहे छे भगवान छो; भग नाम ज्ञान अने आनंदना स्वभावनी लक्ष्मीस्वरूप छो. भाई! ज्ञान अने आनंद ज तारुं स्वरूप छे. वळी तुं अद्भुतनिधि छो. शुं कह्युं? भगवान आत्मा अद्भुतनिधि छे. अहाहा...! जेमां अनंत ज्ञान, अनंत आनंद, अनंत शांति, अनंत स्वच्छता, अनंत प्रभुता इत्यादि अनंत अनंत स्वभावो भर्यां छे एवो महा आश्चर्यकारी खजानो भगवान आत्मा छे.
भाई! तने अबजोनी निधि होय तोपण ते संख्यात छे, तेनी हद छे; ज्यारे आ अद्भुत चैतन्यरत्नाकरनी निधि बेहद-अपार छे. आकाशना प्रदेशोनी संख्या अनंत छे. तेना करतां पण अनंतगुणा गुणरत्नो चैतन्यरत्नाकरमां भर्यां छे. स्वयंभूरमणसमुद्रमां रेतीनी जग्याए नीचे रत्नो भर्यां छे. तेम आ स्वयंभू भगवान आत्मामां-जे स्वयंथी रहेलो-थयेलो छे अने स्वयंथी प्रगट थाय तेवो छे एवा स्वयंभू भगवान आत्मामां- अनंत चैतन्यनां रत्नो भर्यां छे. अहो! परम आश्चर्यकारी स्वरूप भगवान