समयसार गाथा-२०४ ] [ १९७ आत्मानुं छे! माटे कहे छे-भाई! आ बधा बहारना जडना-धूळना भपकानां आकर्षण छोडी दे अने आश्चर्योनुं निधान एवो त्रणलोकनो नाथ भगवान आत्मा अंदर विराजी रह्यो छे त्यां जा, तेमां आकर्षण करी तल्लीन था; तेथी अद्भुत आश्चर्यकारी आनंद प्रगटशे.
माणसने करोड-बे करोड के अबज-बे अबजनी संपत्ति थई जाय तो ओहोहोहो...! एम एने (आश्चर्य) थई जाय छे. पण भाई! ए तो बधी धूळनी धूळ छे. अहीं कहे छे-अंदर त्रणलोकनो नाथ चैतन्यरत्नाकर प्रभु अद्भुत-आश्चर्यकारी निधि छे. अहाहा... जेमां आखुं विश्व जणाय एवी निर्मळ निर्मळ ज्ञानपर्यायो जेने आपोआप उछळे छे एवो आ भगवान आत्मा अद्भुतनिधि चैतन्यरत्नाकर छे. छे अंदर? गजब वात छे भाई! भगवान आत्मा ज्ञाननो, आनंदनो, शांतिनो, वीतरागतानो इत्यादि अनंत अनंत गुणरत्नोनो दरियो छे दरियो. जगतमां तो पैसानी गणतरी होय के-करोड बे करोड आदि. पण आ तो अमाप-अमाप-अमाप गुणरत्नोनो प्रभु आत्मा दरियो छे; महा आश्चर्यकारी छे. जगतमां एवुं कोई तत्त्व नथी के अनंतकाळमां पण तेनी हानि करी शके. आवो आ भगवान चैतन्यरत्नाकर छे.
‘सः एषः भगवान्’ एम कह्युं ने? मतलब के ते ‘आ’ कहेतां आ प्रत्यक्ष वेदनमां आवे तेवो भगवान आत्मा अद्भुतनिधि छे. अहाहा...! जेनुं प्रत्यक्ष वेदन थाय एवो भगवान आत्मा अद्भुत चैतन्यरत्नाकर छे एम कहे छे. अरे! आवा पोताना भगवाननो महिमा छोडीने आ चामडे मढेला रूपाळा देखाता शरीरनो महिमा! पैसानो- धूळनो जडनो महिमा! पुत्रादि परनो महिमा! प्रभु! प्रभु! शुं थयुं तने आ के अंदर ज्ञानानंदनो आश्चर्यकारि दरियो डोली रह्यो छे तेने छोडी तने बहारमां महिमा आवे छे? भाई! विश्वास कर के-हुं प्रत्यक्ष वेदनमां आवे एवो भगवान अद्भुतनिधि चैतन्यरत्नाकर छुं. अहाहा...! भाषा तो जुओ! के ‘अद्भुतनिधि’ एटले के महा विस्मयकारी निधि प्रभु आत्मा छे.
प्रभु! आवो चैतन्यनो दरियो तने नजरे पण पडे नहि? जोवामांय न आवे? तेनी सामुं तुं जुए पण नहि? आम बीजानी सामे जोया करे छे तो शुं छे प्रभु! तने आ? स्त्री रूपाळी होय तो तेनी सामुं जोया करे छे अने बे-पांच लाखना पैसा-धूळ होय तो जोईने राजी राजी थई जाय छे तो शुं थयुं छे प्रभु! तने? आवुं रांकपणुं तने कयांथी प्रगटयुं प्रभु? अने आवी घेलछा!! प्रभु! तुं जो तो खरो तुं अद्भुत निधि छो, भगवान छो, चैतन्यरत्नाकर छो. अहाहाहा...! अंदर जोतां वेंत ज तने अनुपम आनंदनुं प्रत्यक्ष वेदन थशे. अहा! आवो भगवान चैतन्यरत्नाकर आत्मा छे.
हवे कहे छे-आवो भगवान चैतन्यरत्नाकर ‘अभिन्नरसः’ ज्ञानपर्यायोरूपी