१९८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७ तरंगो साथे जेनो रस अभिन्न छे एवो, ‘एकः अपि अनेकीभवन्’ एक होवा छतां अनेक थतो ‘उत्कलिकाभिः’ ज्ञानपर्यायोरूपी तरंगो वडे ‘वल्गति’ दोलायमान थाय छे- उछळे छे.
छे एवो छे. अर्थात् आत्माना ज्ञाननी पर्यायो अनेकरूपे परिणमे छे छतां ते (आत्मा) अभिन्न छे; स्वभावमां एकत्व छे तेमां खंड पडतो नथी.
हवे कोईने थाय के आवुं व्याख्यान? भाई! जो तारे कल्याण करवुं होय तो आ समजवुं पडशे अने आ करवुं पडशे. अहाहा...! कहे छे-कल्याणनो सागर प्रभु तुं छो ने? तेमांथी कण काढ तो तारुं कल्याण थई जशे. अंशीमांथी अंश काढ तो ते अंशमां प्रभु! तुं न्याल थई जईश, तने आनंद थशे, संतोष थशे अने तुं तृप्त-तृप्त-तृप्त थई जईश. जाणे सिद्धपद प्राप्त न थयुं होय एवी तृप्ति थशे. तारी अंदर स्वरूपमां द्रष्टि पडतां चैतन्यरत्नाकर भगवान आत्मा निर्मळथी पण निर्मळ पर्याये उछळशे अने छतां ते अभिन्न रहेशे; तेमां खंड खंड नहि पडे एम कहे छे.
वळी आत्मा स्वरूपे-शक्तिए-गुणे एकरूप होवा छतां ‘अनेकीभवन्’ पर्यायमां निर्मळतानी अनेकताए परिणमे छे अने ते एनुं स्वरूप ज छे. ज्ञानपर्यायोरूपी तरंगो साथे जेनो रस अभिन्न एकमेक छे एवो चैतन्यरत्नाकर प्रभु आत्मा एक होवा छतां अनेक निर्मळथी निर्मळ पर्यायोरूपे थाय छे, अने उद्भवता ज्ञानपर्यायोरूपी तरंगो वडे ‘वल्गति’ डोलायमान थाय छे. शुं कह्युं? के जेम समुद्र तरंगोथी डोलायमान थाय छे तेम स्वना आश्रये उद्भवती निर्मळथी निर्मळ पर्यायो वडे आत्मा पण डोलायमान थाय छे. (आनंदनी भरतीथी डोली ऊठे छे).
हवे आवी वातो? भाई! तने तारा भगवाननी अहीं ओळखाण करावे छे के भगवान! तुं आवो छो. अहाहाहा...! नाथ! तुं त्रणलोकना नाथ-भगवाननी होडमां बेसी शके एवी तारी नात छे हों. आनंदघनजी कहे छे ने के-
‘बीजो मन मंदिर आणुं नहि, ए अम कुलवट रीत जिनेश्वर...’ ‘प्रभु! तारी कुळनी रीतना अमे छीए हों. अहाहा...! सर्वज्ञ परमेश्वरनी नातना अने जातना अमे छीए.’
अरे! पण आवुं एने केम बेसे? पण भाई! स्वरूपना अनुभव विना तारां सर्व आचरण एकडा विनानां मींडां छे.