समयसार गाथा-२०४ ] [ १९९
आप तो ज्ञान-श्रद्धाननी वात करो छो पण अमारां जे आचरण छे तेनी तो कांई किंमत करता ज नथी?
ज्यां मारग ज आवो छे त्यां बीजुं शुं थाय भाई? आ तो जेनो संसारनो अंत नजीक आव्यो छे तेने ज वात बेसशे. तने न बेसे तो शुं थाय? वस्तुनो तो कांई वांक नथी; अज्ञाननो ज वांक छे. वस्तु तो जेम छे तेम छे.
अहीं कहे छे-‘उत्कलिकाभिः’ एटले के ज्ञानपर्यायोरूपी तरंगो वडे आत्मा डोलायमान थाय छे. जेम समुद्र भरतीनी छोळो मारतो उछळे छे तेम भगवान आत्मा चैतन्यरत्नाकर प्रभु ज्ञानपर्यायोरूपी तरंगोनी छोळो मारतो उछळे छे. अहा! अनंतगुणथी भरेलो भगवान आत्मा अंदरमां अंतरएकाग्रतानुं दबाण थतां, जेम फुवारो फाटीने उडे छे तेम, अनंत पर्यायोथी उछळे छे. छे अंदर? के ‘डोलायमान थाय छे-उछळे छे.’ अहाहा...! एक एक कळश तो जुओ! भगवान! आ तारां गाणां गाय छे हों. तुं जेवो छो तेवां तारां गाणां गाय छे भाई! तने तारी मोटप बताववा-मोटप तरफ नजर कराववा-तारी मोटप गाई बतावे छे. आवी वात छे.
‘जेम घणां रत्नोवाळो समुद्र एक जळथी ज भरेलो छे अने तेमां नाना मोटा अनेक तरंगो उछळे छे ते एक जळरूप ज छे.’
शुं कह्युं? के जे तरंगो ऊठे छे ते बधा एक जळरूप-पाणीरूप ज छे. ‘तेम घणा गुणोनो भंडार आ ज्ञानसमुद्र आत्मा एक ज्ञानजळथी ज भरेलो छे.’
जुओ, आकाशना प्रदेशोनो अंत नथी. आकाशनो अंत कयां आवे? (कयांय न आवे.) बस एम ने एम चाल्युं ज जाय छे. आकाश... आकाश... आकाश. ते कयां थई रहे? जो थई रहे तो तेना पछी शुं? ओहोहोहो...! दशे दिशामां आकाश अनंत-अनंत- अनंत चाल्युं जाय छे.
आ लोकना असंख्य जोजनमां तो आकाश छे अने ते पछी पण (अलोकमां) आकाश छे. ते कयां आगळ थई रहे? कयां पुरुं थाय? जो थई रहे तो ते केवी रीते रहे? भाई! ते अनंत छे ने अनंतपणे रहे छे, अंत न आवे एवुं थईने रहे छे. हवे आवुं अमाप-अनंत क्षेत्र बेसवुं कठण पडे एने क्षेत्रनो ‘क्षेत्रज्ञ’ केम बेसे? (न बेसे).
अहाहा...! तारा आत्मद्रव्यनो महिमा शुं कहेवो? जेम आकाशना अनंत प्रदेश छे तेनाथी अनंतगणा गुणरत्नोथी भरेलो आत्मा ज्ञानसमुद्र छे. ते एक ज्ञानजळथी ज भरेलो छे. अहाहा...! तेनी निर्मळथी निर्मळ उद्भवती पर्यायनो पण शुं महिमा कहेवो?