Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 2113 of 4199

 

२०० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७ गंभीर वात छे प्रभु! जेम आकाश अंत विनानुं गंभीर छे तेम आत्मानी ज्ञानपर्याय पण गंभीर छे अने अनंतने जाणनारी भावमां अनंत छे; श्रुतज्ञाननी पर्याय पण हों.

अहीं कहे छे-‘घणा गुणोनो भंडार आ ज्ञानसमुद्र आत्मा एक ज्ञानजळथी ज भरेलो छे अने कर्मना निमित्तथी ज्ञानना अनेक भेदो-व्यक्तिओ आपोआप प्रगट थाय छे ते व्यक्तिओ एक ज्ञानरूप ज जाणवी, खंडखंडरूपे न अनुभववी.’ निमित्तनो अभाव थतां अने स्वभावनी प्रगटता थतां जे अनेक दशाओ उत्पन्न थाय छे ते एक ज्ञानरूप ज जाणवी, खंडखंडरूपे-भेदरूप न अनुभववी. अहा! निश्चय सम्यग्दर्शन अने ज्ञाननी पर्यायो जे एक पछी एक थाय छे तेने खंडखंडरूपे न अनुभववी, पण अभेद ज्ञानरूप ज अनुभववी. आवी वात छे.

*

हवे वळी विशेष कहे छेः-

* कळश १४२ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *

अहाहाहा...! कहे छे-कोई जीवो तो ‘दुष्करतरैः’ अति दुष्कर (महा दुःखे करी शकाय एवां) अने ‘मोक्ष–उन्मुखैः’ मोक्षथी परान्मुख एवां ‘कर्मभिः’ कर्मो वडे ‘स्वयमेव’ स्वयमेव (अर्थात् जिन-आज्ञा विना) ‘क्लिश्यन्तां’ कलेश पामे तो पामो,...’

जुओ, आ अन्यमती मिथ्याद्रष्टिनी वात छे. कहे छे-जे व्यवहार भगवान जिनेश्वरदेवनी आज्ञाथी बहार छे एवां तप, उपवास आदि कर्मो वडे कोई अज्ञानी कलेश पामे तो पामो. मतलब के ते जे कांई पण करे छे ते मिथ्याद्रष्टिपणे करे छे अने ते वडे मात्र कलेशने-दुःखने ज पामे छे.

वळी कहे छे-‘च’ अने ‘परे’ बीजा कोई जीवो ‘महाव्रत–तपः– भारेण’ (मोक्षनी संमुख अर्थात् कथंचित् जिन-आज्ञामां कहेलां) महाव्रत अने तपना भारथी ‘चिरम्’ घणा वखत सुधी ‘भग्नाः’ भग्न थया थका (-तूटी मरता थका) ‘क्लिश्यन्तां’ कलेश पामे तो पामो;...

जुओ, आ मिथ्याद्रष्टि जैननी (जैनाभासीनी) वात करी छे. पहेलां मिथ्याद्रष्टि अजैननी-अन्यमतीनी वात करी अने आ भगवान वीतराग सर्वज्ञदेवनी आज्ञा प्रमाणे महाव्रत आदि पाळे छे एवा जैनाभासीनी वात करे छे. कहे छे-तेओ महाव्रत, समिति, गुप्ति, तप इत्यादि चिरकाळ सुधी पाळीने कलेश पामे तो पामो. शुं कह्युं आ? महाव्रत, तप, समिति, गुप्ति इत्यादि पाळवानो जे राग छे ते कलेश छे. छे अंदर?

जुओ, आ शुं कहे छे अहीं? के जिनाज्ञामां कहेलां महाव्रत अने तप-एना