समयसार गाथा-२०४ ] [ २०१ भारथी चिरकाळ सुधी कलेश पामे तो पामो. एटले शुं? एटले के-परनी (छकायनी) दया पाळवी, सत्य बोलवुं, शरीरथी ब्रह्मचर्य राखवुं, बाह्य (वस्त्रादिनो) त्याग करवो. उपवासादि तप करवुं-इत्यादि जे पाळे छे ते कलेशने पामे छे एम कहे छे. भारे वात छे भाई! पण जुओने! आ शास्त्र पोकार करीने कहे छे ने! भाई! ए रागनुं आचरण सदाचरण नथी पण असदाचरण छे. सदाचरण तो सत् स्वरूप एवा सच्चिदानंदमय भगवान आत्मानां ज्ञान-श्रद्धान अने एमां लीनता रमणता करवी ते छे. बस, आम छे छतां अज्ञानी पोते जे शुभाचरण करे छे तेने धर्म माने छे! छे विपरीतता! भाई! अहीं तो एम कहेवुं छे के-जेने स्वरूपाचरण प्रगटयुं छे एवो सम्यग्द्रष्टि मोक्षमार्गमां छे ज्यारे जिनाज्ञा प्रमाणे पंच महाव्रत आदि पाळनारो मिथ्याद्रष्टि बंधमार्गमां-संसारमार्गमां छे, दुःखना-कलेशना पंथे छे.
अहाहाहा...! भाषा तो जुओ! कहे छे-‘महाव्रत अने तपना भारथी...’ मतलब के महाव्रत ने तप भार छे, बोजो छे; केमके ए बधो राग छे ने! राग छे माटे कलेश छे अने कलेश छे ते बोजो छे. तेमां सहजानंदस्वरूप प्रभु आत्माना आनंदनी परिणति कयां छे? माटे ते बोजो छे, भार छे. अहाहाहा...! अहिंसादि व्रतना परिणाम, समिति, गुप्ति, एकवार भोजन करवुं, नग्न रहेवुं इत्यादि बधो व्यवहार छे ते राग छे, भार छे, बोजो छे.
कहे छे-कोई जीवो महाव्रत अने तपना भारथी घणा वखत सुखी भग्न थया थका-तूटी मरता थका कलेश पामे तो पामो. ल्यो, ‘घणा वखत सुधी’-एटले के करोडो वर्षो सुधी, अबजो वर्षो सुधी. जुओ, कोई आठ वर्षे दीक्षा ले अने करोडो पूर्वनुं आयुष्य होय ने त्यां सुधी महाव्रत ने तप करी करीने तूटी मरे तोय तेने कलेश छे, धर्म नथी- एम कहे छे. केम? केमके ते जिनाज्ञा प्रमाणे व्यवहार तो पाळे छे पण तेने अंतर्द्रष्टि नथी, आत्मद्रष्टि नथी.
तो अमे आ (व्रतादि शुभाचरण) करीए छीए ते शुं धर्म नथी? भाई! तमे गमे ते करो; तमारा परिणामनी जवाबदारी तमारे शिर छे. अहीं तो प्रभु! वस्तु जेम छे तेम कहेवामां आवे छे. (वस्तु साथे तमारा परिणाम मेळववानुं काम तमारुं पोतानुं छे). भाई! आ कोई व्यक्तिनी वात नथी; आ तो सिद्धांतनी वात छे.
अहीं तो आ सिद्ध करे छे के-वीतरागनी आज्ञा बहारना अज्ञानीओ भले पंचाग्नि तप तपे, अणीवाळा लोढाना सळिया पर सूवे अने बार बार वर्ष सुधी ऊभा रहे इत्यादि अनेक आज्ञा बहारनी क्रिया करे तोपण तेओ कलेशने ज पामे छे.