२०२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७ तेओ कलेश करो तो करो, आत्माना ज्ञान विना तेमने धर्म नथी. धर्म तो अंतर्द्रष्टिपूर्वक अंतर-रमणता थाय ते छे, अने ते आनंदरूप छे.
वळी कोई बीजा जिनाज्ञामां कहेला महाव्रत, तप आदि बाह्य क्रियाकांड चिरकाळ सुधी करी करीने तूटी मरे तोपण तेओ कलेशने ज पामे छे. तेओ कलेश करे तो करो, अंतर्द्रष्टि अने स्वसंवेदनज्ञान थया विना तेमने पण धर्मनी प्राप्ति थती नथी. भाई! सम्यग्दर्शन विना अज्ञानी जे कांई करे छे ते कलेश ज छे अने तेनुं फळ चतुर्गतिरूप संसार छे. हवे आवी वात एने आकरी लागे छे. पण भाई! शुं थाय? आ तारा हितनी वात छे बापा!
अन्यमती हो के जैनमती (जैनाभासी) हो; आत्माना सम्यग्दर्शन विना- अहाहाहा...! अंदर निर्मळानंदनो नाथ प्रभु आत्मा विराजे छे तेनी प्रतीति ने भान विना-तेओ जे कांई आचरण (व्रतादि) करे ते कलेश छे, धर्म नथी. आ वात श्री अमृतचंद्राचार्ये मोटेथी पोकारीने खुल्ली-प्रगट करी छे. आ कांई बांधीने (गुप्त) राखी नथी. कहे छे-जेणे आनंदना नाथने जाण्यो नथी, तेने मोहनिद्रामांथी जगाडयो नथी ते गमे तेवा अने गमे तेटला व्रतादि-क्रियाकांडना आडंबर करे तोपण तेनो मोक्ष थतो नथी.
हवे कहे छे-‘साक्षात् मोक्षः’ जे साक्षात् मोक्षस्वरूप छे, ‘निरामयपदं’ निरामय (रोगादि समस्त कलेश विनानुं) पद छे अने ‘स्वयं संवेद्यमानं’ स्वयं संवेद्यमान छे एवुं ‘इदं ज्ञानं’ आ ज्ञान तो ‘ज्ञानगुणं विना’ ज्ञानगुण विना ‘कथम् अपि’ कोई पण रीते ‘प्राप्तुं न हि क्षमन्ते’ तेओ प्राप्त करी शकता ज नथी.
अहाहा...! आ जे साक्षात् मोक्षस्वरूप छे, समस्त रागना रोगथी रहित एवुं निरामय छे अने जे पोताने पोताथी वेदनमां आवे तेवुं छे एवुं आ ज्ञान, ज्ञानगुण विना, प्रत्यक्ष स्वसंवेदनज्ञान विना बीजी कोईपण रीते प्राप्त थई शकतुं नथी. अहाहा...! परम वीतरागी जे मोक्षदशा छे तेने ज्ञानगुण विना, महाव्रतादि कलेशना करनारा अज्ञानीओ बीजी कोई रीते प्राप्त करी शकता नथी. जुओ, आ लखाण आचार्यदेवना छे के कोई बीजाना (सोनगढना) छे? भाई! तने माठुं लागे तो माफ करजे; क्षमा करजे; पण आ सत्य छे.
ए तो त्यां ‘पद्मनंदी पंचविंशति’ मां ब्रह्मचर्यनी व्याख्या करी छे एमां कह्युं छे- शुं? के ब्रह्म नाम निर्मळानंदनो नाथ प्रभु आत्मा तेमां चरवुं, रमवुं ने ठरवुं ते ब्रह्मचर्य छे. आवी घणी बधी व्याख्या करीने पछी दिगंबर संत अतीन्द्रिय आनंदना अनुभवनारा श्री पद्मनंदी स्वामी कहे छे-हे युवानो! तमने विषयना रसमां मजा होय अने अमारी वाणी तमने ठीक न लागती होय तो माफ करजो; अमे तो