Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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समयसार गाथा-२०४ ] [ २०३ मुनि छीए. (मतलब के अमारी पासे आ सिवाय बीजी शी वात करवानी होय?) प्रभु! अमे तो तमने ब्रह्मचर्यनी एटले आत्मरमणतानी वात करीए छीए. पण युवानीना मदमां-शरीर फाटुफाटु थतुं होय एना मदमां-, अने विषयना रसना घेनमां - आ शुं वात करे छे? -एम तने अमारी वात न रुचती होय तो क्षमा करजे भाई क्षमा करजे बापा! अमे तो वनवासी मुनि छीए. अहा! वनवासी दिगंबर संत आम कहे छे! तेम मारग तो आ ज छे बापा! तने न गोठे तो क्षमा करजे भाई! पण ‘एक होय त्रणकाळमां परमारथनो पंथ.’ अहीं कहे छे-ज्ञान एटले ज्ञानानंदस्वरूपी भगवान आत्मा ज्ञानगुण विना बीजी कोई पण रीते अज्ञानीओ प्राप्त करी शकता नथी. आवी वात छे.

* कळश १४२ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘ज्ञान छे ते साक्षात् मोक्ष छे;’... शुं कह्युं? आत्मा जे सर्वज्ञस्वभावी छे तेनुं जे ज्ञान छे ते (ज्ञान) साक्षात् मोक्ष छे. अहीं एम कहेवुं छे के अशुभ टाळवा माटे जे आ दया, दान, व्रत, तप, भक्ति इत्यादिनो व्यवहार छे ते होय छे खरो, पण ते मोक्षनुं कारण नथी. ज्ञाननी एकाग्रतानी दशा थवा छतां, पूर्णदशा न होय त्यारे वचमां व्यवहारनो राग आवे छे खरो पण ते कांई मोक्षनुं कारण नथी. मोक्षनुं कारण तो एक ज्ञाननी एकाग्रता ज छे. ज्ञानानंदस्वरूप भगवान आत्मानुं जे ज्ञान छे अर्थात् ज्ञाननुं जे ज्ञान छे ते ज्ञाननी एकाग्रता छे अने ते एकाग्रता मोक्षनुं कारण छे. आवी वात छे. आ निर्जरा अधिकार छे ने!

ज्ञानस्वभावी आत्मानी सन्मुख थतां जे ज्ञान थाय छे-ज्ञाननी पर्याय थाय छे ते वीतरागी पर्याय छे. अहा! ते वीतरागी पर्याय वडे आत्माने केवळज्ञान थाय छे. तेथी कह्युं के-‘ज्ञान छे ते साक्षात् मोक्ष छे.’ एक रीते कहीए तो ज्ञानस्वरूपी भगवान आत्मा मोक्षस्वरूप ज छे अने तेमां ज्ञाननी जे पर्याय एकाग्र थाय छे ते पण मोक्षस्वरूप छे.

ए ज कहे छे के-‘ते (मोक्ष) ज्ञानथी ज मळे छे.’ अहाहा...! आत्मा ज्ञान अने आनंदनी लक्ष्मीथी भरेलो भगवान छे. अर्थात् ज्ञान ने आनंद आत्मानी स्वरूपसंपदा छे. ते स्वरूपसंपदाना सन्मुखनी एकाग्रताथी - ज्ञानना परिणमनथी-स्वभावना परिणमनथी मोक्ष मळे छे. जुओ, छे? के ‘ते (मोक्ष) ज्ञानथी ज मळे छे?’ भाषा जुओ तो खरा! ‘ज’ नाख्यो छे.

प्रश्नः– आ तो एकान्त थई गयुं; व्यवहार करतां करतां अने व्रत-तप करतां करतां पण मोक्ष थाय एम न आव्युं?