Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२०४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-७

समाधानः– भाई! आ सम्यक् एकान्त छे. एनो अर्थ ज ए छे के ज्ञानसन्मुखनी एकाग्रताथी-ज्ञानना परिणमनथी मोक्ष थाय छे पण बीजी कोई रीते थतो नथी. व्यवहार करतां करतां-राग करतां करतां वीतरागतास्वरूप मोक्ष केम थाय? (कदीय न थाय). ज्ञानना परिणमनमां ज्ञाननी प्रतीति, ज्ञाननुं ज्ञान अने ज्ञानमां रमणता-एम त्रणे आवी गयां. रागनी क्रिया तो एनाथी भिन्न रही गई. समजाणुं कांई...?

व्यवहार-राग मोक्षनुं कारण नथी एम निषेध कर्यो त्यां एम नथी के व्यवहार छे ज नहि, होतो ज नथी. व्यवहार कर्ता नथी अर्थात् व्यवहारथी निश्चय प्रगटे छे एम नथी. छतां सम्यग्द्रष्टिने ज्यां सुधी पूर्ण वीतरागता न थाय त्यां सुधी व्यवहार होय छे, आवे छे; पण ते मोक्षनुं कारण नथी. (उपचार करीने कहेवामां आवे ए जुदी वात छे). आ वात व्यवहारना पक्षवाळाने आकरी पडे छे, खटके छे. तेने एम थाय छे के व्रत- तपनुं आचरण बधुं कयां गयुं? एनो ज अहीं खुलासो करे छे-

के ‘अन्य कोई क्रियाकांडथी तेनी (मोक्षनी) प्राप्ति थती नथी.’ जुओ, आ अस्ति-नास्ति कर्युं; आ अनेकान्त कर्युं के-‘ते ज्ञानथी ज मळे छे, अन्य कोई क्रियाकांडथी तेनी प्राप्ति थती नथी.’ अज्ञानी अनेकान्त एम करवा मागे छे के-निश्चयथी पण मुक्ति थाय छे अने व्यवहारथी पण मुक्ति थाय छे. पण भाई! आवुं अनेकान्त नथी; आ तो फुदडीवाद छे.

अनेकान्त तो आ छे के-वस्तु जे चिदानंदघनस्वभाव छे तेनी एकाग्रता ते ज मोक्षनुं कारण छे पण अन्य क्रियाकांड मोक्षनुं कारण नथी. व्रत, तप, भगवाननी भक्ति, जात्रा इत्यादि क्रियाकांडथी कोई दि’ निर्जरा थती नथी अर्थात् मोक्ष थतो नथी. आवी चोख्खी वात छे.

[प्रवचन नं. २७८ थी २८०*दिनांक ३१-१२-७६ थी २-१-७७]