Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२२० [ समयसार प्रवचन

स्पर्शावायोग्य एवा कमलिनी-पत्रना स्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां जळथी स्पर्शावापणुं अभूतार्थ-छे असत्यार्थ छे; एवी रीते अनादि काळथी बंधायेला आत्मानो, पुद्गलकर्मथी बंधावा-स्पर्शावारूप अवस्थाथी अनुभव करतां बद्धस्पृष्टपणुं भूतार्थ छे- सत्यार्थ छे, तोपण पुद्गलथी जराय नहि स्पर्शावायोग्य एवा आत्मस्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां बद्धस्पृष्टपणुं अभूतार्थ छे-असत्यार्थ छे. वळी, जेम माटीनो, कमंडळ, घडो, झारी, रामपात्र आदि पर्यायोथी अनुभव करतां अन्यपणुं भूतार्थ छे-सत्यार्थ छे, तोपण सर्वतः अस्खलित (-सर्व पर्यायभेदोथी जराय भेदरूप नहि थता एवा) एक माटीना स्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां अन्यपणुं अभूतार्थ छे-असत्यार्थ छे; एवी रीते आत्मानो, नारक आदि पर्यायोथी अनुभव करतां (पर्यायोना बीजा-बीजापणारूप) अन्यपणुं भूतार्थ छे-सत्यार्थ छे, तोपण सर्वतः अस्खलित (सर्व पर्यायभेदोथी जराय भेदरूप नहि थता एवा) एक चैतन्याकार आत्मस्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां अन्यपणुं अभूतार्थ छे-असत्यार्थ छे. जेम समुद्रनो, वृद्धिहानिरूप अवस्थाथी अनुभव करतां अनियतपणुं (अनिश्चितपणुं) भूतार्थ छे-सत्यार्थ छे, तोपण नित्य-स्थिर एवा समुद्रस्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां अनियतपणुं अभूतार्थ छे-असत्यार्थ छे; एवी रीते आत्मानो, वृद्धिहानिरूप पर्यायभेदोथी अनुभव करतां अनियतपणुं भूतार्थ छे-सत्यार्थ छे, तोपण नित्य-स्थिर (निश्चल) एवा आत्मस्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां अनियतपणुं अभूतार्थ छे-असत्यार्थ छे. जेम सुवर्णनो, चीकणापणुं, पीळापणुं, भारेपणुं आदि गुणरूप भेदोथी अनुभव करतां विशेषपणुं भूतार्थ छे-सत्यार्थ छे. तोपण जेमां सर्व विशेषो विलय थई गया छे एवा सुवर्णस्वभावथी समीप जईने अनुभव करतां विशेषपणुं अभूतार्थ छे- असत्यार्थ छे; एवी रीते आत्मानो, ज्ञान, दर्शन आदि गुणरूप भेदोथी अनुभव करतां विशेषपणुं भूतार्थ छे-सत्यार्थ छे, तोपण जेमां सर्व विशेषो विलय थई गया छे एवा आत्मस्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां विशेषपणुं अभूतार्थ छे- असत्यार्थ छे. जेम जळनो, अग्नि जेनुं निमित्त छे एवी उष्णता साथे संयुक्तपणारूप- तप्तपणारूप-अवस्थाथी अनुभव करतां (जळने) उष्णपणारूप संयुक्तपणुं भूतार्थ छे- सत्यार्थ छे, तोपण एकांत शीतळतारूप जळस्वभावनी समीप जईने अनुभव करतां (उष्णता साथे) संयुक्तपणुं अभूतार्थ छे-असत्यार्थ छे; एवी रीते आत्मानो, कर्म जेनुं निमित्त छे एवा मोह साथे संयुक्तपणारूप अवस्थाथी अनुभव करतां संयुक्तपणुं भूतार्थ छे-सत्यार्थ छे,