Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 14.

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गाथा–१४
जो पस्सदि अप्पाणं अबद्धपुट्ठं अणण्णयं णियदं।
अविसेसमसंजुत्तं तं
सुद्धणयं वियाणीहि।।
१४।।

यः पश्यति आत्मानम् अबद्धस्पृष्टमनन्यकं नियतम्।
अविशेषमसंयुक्तं तं
शुद्धनयं विजानीहि।। १४।।

ए शुद्धनयने गाथासूत्रथी कहे छेः-

अबद्धस्पृष्ट, अनन्य ने जे नियत देखे आत्मने,
अविशेष, अणसंयुक्त,
तेने शुद्धनय तुं जाणजे. १४.

गाथार्थः– [यः] जे नय [आत्मानम्] आत्माने [अबद्धस्पृष्टम्] बंध रहित

ने परना स्पर्श रहित, [अनन्यकं] अन्यपणा रहित, [नियतम्] चळाचळता रहित, [अविशेषम्] विशेष रहित, [असंयुक्तं] अन्यना संयोग रहित-एवा पांच भावरूप [पश्यति] देखे छे [तं] तेने, हे शिष्य! तुं [शुद्धनयं] शुद्धनय [विजानीहि] जाण.

टीकाः– निश्चयथी अबद्ध-अस्पृष्ट, अनन्य, नियत, अविशेष अने असंयुक्त-

एवा आत्मानी जे अनुभूति ते शुद्धनय छे, अने ए अनुभूति आत्मा ज छे; ए रीते आत्मा एक ज प्रकाशमान छे. (शुद्धनय कहो या आत्मानी अनुभूति कहो या आत्मा कहो-एक ज छे, जुदां नथी.) अहीं शिष्य पूछे छे के जेवो उपर कह्यो तेवा आत्मानी अनुभूति केम थई शके? तेनुं समाधानः-बद्धस्पृष्टत्व आदि भावो अभूतार्थ होवाथी ए अनुभूति थई शके छे. आ वातने द्रष्टांतथी प्रगट करवामां आवे छेः-

जेम कमलिनीनुं पत्र जळमां डूबेलुं होय तेनो जळथी स्पर्शावारूप अवस्थाथी अनुभव करतां जळथी स्पर्शावापणुं भूतार्थ छे-सत्यार्थ छे, तोपण जळथी जराय नहि