अविसेसमसंजुत्तं तं सुद्धणयं वियाणीहि।।
अविशेषमसंयुक्तं तं
अविशेष, अणसंयुक्त, तेने शुद्धनय तुं जाणजे. १४.
ने परना स्पर्श रहित, [अनन्यकं] अन्यपणा रहित, [नियतम्] चळाचळता रहित, [अविशेषम्] विशेष रहित, [असंयुक्तं] अन्यना संयोग रहित-एवा पांच भावरूप [पश्यति] देखे छे [तं] तेने, हे शिष्य! तुं [शुद्धनयं] शुद्धनय [विजानीहि] जाण.
एवा आत्मानी जे अनुभूति ते शुद्धनय छे, अने ए अनुभूति आत्मा ज छे; ए रीते आत्मा एक ज प्रकाशमान छे. (शुद्धनय कहो या आत्मानी अनुभूति कहो या आत्मा कहो-एक ज छे, जुदां नथी.) अहीं शिष्य पूछे छे के जेवो उपर कह्यो तेवा आत्मानी अनुभूति केम थई शके? तेनुं समाधानः-बद्धस्पृष्टत्व आदि भावो अभूतार्थ होवाथी ए अनुभूति थई शके छे. आ वातने द्रष्टांतथी प्रगट करवामां आवे छेः-
जेम कमलिनीनुं पत्र जळमां डूबेलुं होय तेनो जळथी स्पर्शावारूप अवस्थाथी अनुभव करतां जळथी स्पर्शावापणुं भूतार्थ छे-सत्यार्थ छे, तोपण जळथी जराय नहि