शुभरागना विकल्पने पण पोतानो मानवो ए मिथ्यात्व छे. पुण्य-पापना भावने शास्त्रमां पुद्गलना कह्या छे, कारण के एमां चेतननो-ज्ञाननो अंश नथी. राग चैतन्यना अभावरूप छे, तेमां चैतन्यना नूरनो अंश पण नथी. दया, दान, भक्ति, पूजा इत्यादि विकल्पमां भगवान चैतन्यनी जाति नथी, तेथी पुद्गलना कह्या छे.
अने ज्ञेयोना भेदथी ज्ञानमां भेद मालूम पडवो तेने विकल्प कहे छे. ज्ञेयना भेदथी ज्ञानमां भेद मालूम पडे छे ए अनंतानुबंधीनो विकल्प छे. अनेकने जाणवारूप पर्याय तो थई छे पोताथी अने खरेखर तो ज्ञान एकरूपे रहीने पोताने जाणे छे. एकपणामां अनंतपणुं-खंडपणुं थई जाय छे एम नथी; छतां ज्ञेयना भेदथी ज्ञानमां खंड-भेद मालूम पडवो ए विकल्प छे. आवा संकल्पविकल्पथी भगवान आत्मा भिन्न छे. सम्यग्दर्शन थतां अर्थात् पूर्णस्वरूपनो अनुभव थतां संकल्प-विकल्प नाश पामी जाय छे. आवा आत्मस्वभावने प्रगट करतो शुद्धनय उदय पामे छे.