Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भाग-१ ] २१७

एनाथी अनंतगुणा एक जीवमां गुण छे. आ बधा गुण पूर्ण छे. अने आवा अनंत गुण-शक्तिओथी परिपूर्ण आत्मद्रव्य छे. शुद्धनय आवा पूर्णशक्तिओथी मंडित जे समस्त लोकालोकने जाणवाना सामर्थ्यवाळो आत्मस्वभाव छे तेने प्रगट करे छे. ज्ञानमां जे भेद पडे छे ए तो कर्मसंयोगथी छे. शुं कह्युं? आ मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्यय, केवळज्ञानए जे पर्यायना भेदो छे ए तो कर्मना निमित्तनी अपेक्षाथी छे. वस्तुमां (ज्ञान-स्वभावमां) भेद नथी. शुद्धनयमां कर्म अने कर्मनी अपेक्षा गौण छे. शुद्धनय तो एकमात्र पूर्ण स्वभावने प्रगट करे छे. भाई! आ चीजने समजवी ए कोई अलौकिक पुरुषार्थ छे.

वळी ते, ‘आदि–अन्त–विमुक्तम्’ आत्मस्वभावने आदिअंतथी रहित प्रगट

करे छे. वस्तु त्रिकाळी पूर्णस्वरूप भगवान आत्मा छे. ए आदि-अंतविमुक्त छे. जेवो आत्मा आदि-अंत रहित छे तेवो स्वभाव पण आदि-अंत रहित छे. ‘छे’ एनी आदि शुं? ‘छे’ एनो अंत शुं? ‘छे’ एमां अपूर्णता शुं? ‘छे’ एमां विकार शुं? चीज छे ते ज्यारे नजर नाखे त्यारे चीज छे. शुद्धनय, कोई आदिथी मांडीने जे कोईथी उत्पन्न करवामां आव्यो नथी अने कयारेय कोईथी जेनो विनाश नथी एवा पारिणामिकभावने प्रगट करे छे. पारिणामिक एटले जेमां निमित्तना सद्भाव के अभावनी अपेक्षा नथी एवो सहजस्वभाव. एकलो परम पारिणामिकस्वभाव- भावरस ज्ञानरस, आनंदरस, शांतरस, वीतरागरस एवा अनंतरसनुं जे अनादि- अनंत एकरूप तेने प्रगट करे छे. परमाणु जे पर्यायविनानुं (द्रव्य) छे तेने पण पारिणामिकभाव कहे छे. अहीं तो जीवना ज्ञायक-भावरूप पारिणामिकनी वात छे. पर्याय रहित द्रव्य ए परमपारिणामिकभाव छे. तेने शुद्धनय प्रगट करे छे.

वळी ते, ‘एकम्’ आत्मस्वभावने एक एटले सर्व भेदभावोथी रहित

एकाकार प्रगट करे छे. आत्मा अने पर्याय एवा द्वैतभावथी रहित अभेद एकाकार प्रगट करे छे. कोईने लागे के वेदांत जेवुं तो नथी थई जतुं ने? भाई, वेदांतमां द्रव्य, गुण अने पर्याय छे ज कयां? अहीं तो शुद्धनय एकरूप चैतन्यप्रकाशनो पुंज जे परमस्वभावभाव तेने प्रगट करे छे एम वात छे.

अने ‘विलान सङ्कल्प–विकल्प–जालं’ जेमां समस्त संकल्प-विकल्पना समूहो

विलय थई गया छे एवो प्रगट करे छे. द्रव्यकर्म-जड, भावकर्म-विकार, नोकर्म-शरीरादि पुद्गल द्रव्योमां मारापणानी कल्पना करवी एने संकल्प कहे छे, ए मिथ्यात्व छे.