आ वात लीधी छे के-‘आत्मा पर्यायविशेषथी नहि आलिंगित एवुं शुद्ध द्रव्य छे.’ उपरांत समयसार गाथा ४९ ना अव्यक्तना पांचमा बोलमां पण आवे छे के- ‘व्यक्तपणुं अने अव्यक्तपणुं भेळां मिश्रितरूपे तेने प्रतिभासवा छतां पण ते व्यक्तपणाने स्पर्शतो नथी माटे अव्यक्त छे.’ अहीं कहे छे के आवो जे आत्मा शुद्ध ज्ञायकभाव परम-पारिणामिकस्वभाव तेने प्रगट करतो शुद्धनय उदयरूप थाय छे.
परद्रव्यना भावो तथा परद्रव्यना निमित्तथी थता पोताना विभावो-एवा परभावोथी भिन्न प्रगट करे छे. जोयुं? ‘पोताना विभावो’ एम शब्द लीधो छे. परद्रव्यना निमित्तथी थतां नैमित्तिक विभावभावो ए कोई निमित्तथी थया नथी निमित्त तो निमित्तमां छे अने पोतानी पर्याय पोतामां थाय छे पंचास्तिकाय गाथा ६२ मां आवे छे के-विकार थवामां परकारकनी अपेक्षा नथी. निश्चयथी विकार परनी अपेक्षा विना थाय छे. अहीं जे कह्युं के ‘परद्रव्यना निमित्तथी थवावाळा’ ए तो निमित्तनुं ज्ञान कराव्युं छे. बाकी निश्चयथी विकार थाय छे पोतामां पोतानी अपेक्षाथी, परकारकनी एमां अपेक्षा छे ज नहि. परद्रव्यना निमित्तना संबंधे पोतामां योग्यताथी पर्याय थाय छे. पर्याय थाय छे पोताथी, परथी नहीं. ए विकारी पर्यायथी पण आत्मा भिन्न छे. अहीं त्रण वात कही परद्रव्य जे शरीर, मन, वचन, कर्म आदि, परद्रव्यना भाव एटले कर्मना उदयादि तथा परद्रव्यना निमित्तथी थता पोताना विभावभावो जे विकारादि-ते सर्व परभावोथी भिन्न आत्माने शुद्धनय प्रगट करे छे.
कोई प्रश्न करे के ‘एवा परभावोथी’ एम कह्युं एमां पर्याय (वर्तमान) आवे के नहीं? समाधान एम छे के-पर्याय छे तो द्रव्यथी भिन्न, पण ए वात अहीं नथी. त्रिकाळीने विषय करनारी पर्याय, कर्म, कर्मनो भाव अने विभावथी भिन्न पडीने अंतरमां द्रव्य तरफ झुके छे-त्यारे ए पर्याय आत्मस्वभावने परभावोथी भिन्न प्रगट करे छे.
वळी ते, ‘आपूर्णम्’ आत्मस्वभाव समस्तपणे पूर्ण छे एम प्रगट करे छे. ज्ञानथी पूर्ण, दर्शनथी पूर्ण, आनंदथी पूर्ण, शांतिथी पूर्ण, स्वच्छताथी पूर्ण, प्रभुताथी पूर्ण, कर्ताथी पूर्ण, कर्मथी पूर्ण इत्यादि समस्त अनंत शक्तिओथी आत्मस्वभाव परिपूर्ण छे.
त्रण लोकमां (संख्याए) अनंत जीव छे. एनाथी अनंतगुणा परमाणु छे. एनाथी अनंतगुणा त्रणकाळना समयो छे. एनाथी अनंतगुणा आकाशना प्रदेशो छे.