नहीं-एवा शुकल लेश्याना मंदकषायना परिणाम थया, तथा तेना फळमां स्वर्गे गयो. पण एमां शुं थयुं? जन्म-मरण मटयां नहीं. स्वर्गनो भव हो के नरकनो-चारेय गति दुर्गति छे, एक सिद्धपद सुगति छे. भगवान आत्मानी यथार्थ द्रष्टि करी सिद्धपदनी साधना प्रगट करवी जोईए.
हवे शुद्धनयनो उदय थाय छे, एनी सूचनारूप श्लोक कहे छेः-
‘शुद्धनयः आत्मस्वभावम् प्रकाशयन् अभ्युदेति’ शुद्धनय आत्माना स्वभावने प्रगट करतो उदयरूप थाय छे. ज्ञाननी जे पर्याय त्रिकाळी ध्रुवने विषय करे तेने शुद्धनय कहे छे. विषय अने विषयी एवो भेद काढी नाखीने गाथा ११मां त्रिकाळी ध्रुव वस्तुने ज शुद्धनय कह्यो छे. ‘भूयत्थो देसिदो दु सुद्धनओ.’ एक समयनी पर्याय सिवायनी आखी चीज जे सत्यार्थ अनादि-अनंत शुद्ध अखंड द्रव्य छे ते शुद्धनय छे- एम कुंदकुंदाचार्य देव कहे छे. अध्यात्ममां नय-विषयी अने एनो विषय-द्रव्य एटलो भेद पण काढी नाखवामां आवे छे. त्रिकाळीने सत्यार्थ कहीने पर्यायने गौण करीने असत्यार्थ कही. पर्याय अने परनुं लक्ष छोडाववा माटे पर्याय होवा छतां एने गौण करीने व्यवहार कही. परवस्तु जे व्यवहार छे ए स्वनी अपेक्षाए असत् छे. स्वद्रव्यनी अपेक्षाए परवस्तु अद्रव्य छे. एवी रीते त्रिकाळीनी अपेक्षाए पर्यायने गौण करीने असत्-असत्या कहेवामां आवी छे. भाई! आ तो केवळी परमात्मानी कहेली वात छे. नियमसार गाथा ८ नी टीकामां कह्युं छे के-“परमागम भव्योए कर्णरूपी अंजलिथी पीवा योग्य अमृत छे.” आ तो अमृतना प्याला छे; जेनां भाग्य होय तेने सांभळवा मळे. वर्तमानमां बहु ज गरबड छे. सत्य वातने निश्चयाभास कहे छे. कहे छे के व्यवहारने मानता नथी. परंतु कोण कहे छे के व्यवहार नथी? व्यवहार छे, परद्रव्य छे, राग छे, पर्याय छे. परंतु सम्यग्दर्शन अने ज्ञाननी प्राप्ति कराववाना प्रयोजननी सिद्धि अर्थे त्रिकाळी द्रव्यने सत्य कह्युं अने पर्यायने गौण करी व्यवहार कही असत्य कही छे. वेदांतमां आ द्रव्य अने आ पर्याय एवुं कयां छे? आ गौण करवुं एवुं कयां छे? बधी जूठी वात छे. वेदांतमां निश्चयनी वातो बहु करे पण पर्याय अनित्य छे एम वात आवे त्यां भडके. जैनमां पण व्रत करवां, तप करवुं, उपवास करवा एम वात आवे तो समजे, पण अध्यात्मनी वात आवे तो चमके के हें!
भगवान! एकवार सांभळ तो खरो. जे पर्यायने स्पर्शती नथी एवी तारी चीज अंदर परमात्मस्वरूपे पडी छे. प्रवचनसार गाथा १७२ ना अलिंगग्रहणना १९ मा बोलमां