छे. जे राग उत्पन्न थाय छे ए दुःखनुं कारण छे, दुःख ज छे. तेथी भेदने गौण करी भगवान सर्वज्ञदेवे जेवो आत्मा जोयो छे ते शुद्ध चैतन्यघन आनंददळमां द्रष्टि करवी जोईए. तेथी सम्यग्दर्शनरूप धर्म थाय छे.
वस्तु जेवी अनंतगुणरूप अने एक समयनी पर्यायरूप के जेमां लोकालोक जाणवानी शक्ति छे एवी वस्तुस्वरूपनी यथार्थ श्रद्धा विना अनुभव करवामां आवे ते मिथ्यात्व छे. वस्तुस्वरूपनी यथार्थ श्रद्धा विना घणा वेदांती एम कहे छे के अमे शुद्ध अद्वैतनो अनुभव करीए छीए पण ए अनुभव ज नथी.
भगवाने अनंत आत्मा, एनाथी अनंतगुणा परमाणु, असंख्य कालाणु, एक धर्मास्ति, एक अधर्मास्ति अने एक आकाश एवां छ द्रव्यो जोयां छे. अने ए बधां द्रव्योने जाणवावाळी पर्याय पण छे. ए पर्यायथी भिन्न आखुं आत्मदळ पडयुं छे. पर्यायथी आवा चैतन्यदळनी द्रष्टि करतां विकल्प तूटी जाय छे, राग रहेतो नथी. त्यारे निर्विकल्पदशामां शुद्ध अद्वैतनो अनुभव थाय छे, अने त्यारे प्रगट परम आनंद प्राप्त थाय छे. एने सम्यग्दर्शन अने सम्यग्ज्ञान कहेवामां आवे छे.
हुं शुद्ध छुं, हुं शुद्ध छुं एम कह्या करे पण शुद्ध चीज शुं छे अने कई रीते छे ए जाण्या विना शुद्ध अनुभव साचो नथी, ए तो मिथ्यात्व छे. सर्वथा अद्वैतवादीने शून्यनो प्रसंग होवाथी उलटी श्रद्धामां जे रागनो अनुभव थयो ए तो आकाशना फूलना अनुभव जेवो अनुभव थयो. आकाशमां जेम फूल नथी तेम एने वस्तुनो अनुभव नथी.
ज्ञानमां प्रथम एवो निर्णय करे के हुं तो अनंतगुणनो पिंड चैतन्यमात्र वस्तु छुं. आ निर्णय करनारी तो पर्याय छे, पण ते पर्याय एम जाणे छे के-हुं तो त्रिकाळी ध्रुव छुं. समयसार गाथा ३२०नी जयसेनाचार्यनी टीकामां आवे छे केः पर्याय एवो निर्णय करे छे के-सकळ निरावरण, अखंड-खंड नहीं, एक-भेद नहीं, प्रत्यक्ष-परोक्ष नहीं प्रतिभासमय-जाणवामां आवे छे एवो, अविनश्वर, नित्य ध्रुव शुद्धपारिणामिक- परमभावलक्षण, निजपरमात्मद्रव्य ते ज हुं छुं. पर्याय एम जाणे छे के हुं आ छुं, हुं पर्याय छुं एम जाणती नथी. निर्णय-कार्य पर्यायमां थाय छे, ध्रुवमां नहीं. ध्रुव तो त्रिकाळ-निरावरण कारणरूप छे, तेने कारणपरमात्मा कहे छे.
भाई! परमात्मस्वरूप भगवान आत्मानो मार्ग तो कोई अलौकिक छे. ते वस्तुद्रष्टि विना अनंतकाळमां पण प्राप्त थयो नहीं. अगियार अंगनुं ज्ञान कर्युं, नव पूर्वनी लब्धि प्रगटी, अने शुकल लेश्या-चामडी उतारीने खार छांटे तोपण आंखनो खूणो लाल थाय