Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भाग-१ ] २१३

नंदनी प्राप्ति थाय छे, एनुं नाम अद्वैत कह्युं छे. अद्वैत एटले बधुं एक छे एम नहीं. आ रीते अनुभव कराववा माटे एम कह्युं के ‘शुद्ध अनुभवमां द्वैत भासतुं नथी.’ पंडितजी अहीं खुलासो करे छे के-जो बाह्य वस्तुओनो लोप करवामां आवे तो आत्मानो ज लोप थई जशे. आत्मा वस्तु दर्शन-ज्ञानस्वभाव छे. तेनी एक एक समयनी पर्याय प्रगट थाय छे. आत्मानी ज्ञाननी पर्यायमां आखा लोकालोकने जाणवानी ताकात छे. हवे जो बाह्यवस्तु-लोकालोक न होय तो तेने जाणनारी ज्ञाननी पर्याय पण न होय, अने जो पर्याय न होय तो जेनी ए पर्याय छे एवी अनंत पर्यायोनो पिंड आत्मा ज न होय. तेथी जो लोकालोकने न मानवामां आवे तो पोतानो ज लोप थई जाय, अने ए प्रमाणे शून्यवादनो प्रसंग आवे. आत्मानी श्रुतज्ञाननी पर्यायमां पण परोक्षपणे लोकालोकने जाणवानी ताकात छे. जो लोकालोकने न माने तो तेने जाणनार पोतानी पर्यायने पण न मानी, आवी अनंती पर्यायनो आधार जे ज्ञानगुण ते पण न मान्यो अने तो अनंत गुणनो पिंड जे आत्मा पोते छे तेने पण न मान्यो. आम सर्व शून्यवादनो प्रसंग आवी जाय. माटे तमो कहो छो ते प्रमाणे वस्तुनी सिद्धि थई शकती नथी. तमे अद्वैत ज कहो छो, बीजुं कांई छे ज नहीं एम कहो छो. द्रव्य एकलुं छे अने पर्याय पण नथी तो द्रव्य छे एनो निर्णय करवावाळुं कोण छे? जे अनित्य पर्याय छे ते नित्य (वस्तु)नो निर्णय करे छे. जो तमे एकलुं नित्यने मानशो तो ते माननारी-निर्णय करनारी पर्यायनो नाश थई जशे. ते प्रसंगमां नित्यनो पण अभाव ज थई जशे. आम वस्तु द्रव्य-पर्याय स्वरूप छे, तेमां ध्रुव नित्यानंदस्वरूप जे ज्ञायकभाव द्रव्य तेमां द्रष्टि करतां एकलो अभेदनो, निर्विकल्प आनंदनो अनुभव थाय छे. आवा अभेद आत्मानो अनुभव कांई विशेष (झाझुं) ज्ञान होय तो ज थाय एम नथी. नरकमां पडेलो नारकी जीव, आठ वर्षनी बाळकी तथा तिर्यंच पण अनुभवपूर्वक समकित पामे छे. अढीद्वीप ज्यां मनुष्यो छे त्यां पण तिर्यंचो छे अने अढीद्वीप बहार असंख्य द्वीप-समुद्रमां असंख्य तिर्यंचो छे जे पांचमा गुणस्थानवाळां छे. एमां शुं छे? आत्मा छे ने? एक त्रिकाळ ध्रुव आत्मानी द्रष्टि थवी जोईए. अनादिथी जीव एक समयनी पर्यायमां (भेदमां) रमे छे. (एने ज जुए छे) पर्यायनी पाछळ आखुं ध्रुव द्रव्य पडयुं छे एने जोतो नथी. जेम सोनानी कुंडल, कडुं, वींटी आदि पर्यायनी पाछळ पूरुं सोनुं पडयुं छे के नहीं? एम एक समयनी प्रगट ज्ञाननी जे पर्याय छे ए पर्यायनी पाछळ एकरूप परमात्मतत्त्वरूप पूर्ण ज्ञायकदळ पडयुं छे. ते अनंतगुण-मंडित छे. पण गुण-गुणीना भेद पर नजर करवाथी विकल्प राग ऊठे