चैतन्यवस्तुनो अनुभव थतां कोई भेद जणातो नथी, एकाकार चिन्मात्र ज देखाय छे. एकांत थई गयुं ने? सम्यक्अनुभवमां एकांत ज जणाय छे. एने सम्यग्दर्शन अने धर्म कहेवामां आवे छे.
अहीं विज्ञानाद्वैतवादी तथा वेदांती कहे छे के-अंते तो परमार्थरूप अद्वैतनो ज अनुभव थयो. अमे तो अद्वैत कहीए ज छीए. तमारामां पण अद्वैत आव्युं. तमे कह्युं ने के-‘अनुभवमां द्वैत ज भासतुं नथी’-द्वैत कांई छे ज नहीं. ए ज अमारो मत छे. वेदांत कहे छे के एक ज आत्मा सर्वव्यापक अभेद छे. विज्ञान-अद्वैतवादी पण एवुं कहे छे. आ रीते अज्ञानी प्रश्न करे छे के नय, निक्षेपनी बहु लांबीलांबी वात करीने तमे विशेष शुं कह्युं? तेनो उत्तरः–
तमारा मतमां सर्वथा अद्वैत-एटले बे नहीं, एक ज मानवामां आवे छे. अज्ञानीना मत प्रमाणे सर्वथा अद्वैत मानवामां आवे तो पर एवी बाह्य वस्तुनो अभाव ज थई जाय. आत्मा राग, आदि जे परज्ञेयने जाणे छे ते सर्व चीजनो अभाव थई जाय. पण एवो अभाव तो प्रत्यक्ष विरुद्ध छे. अमारा मतमां नयविवक्षा छे, अपेक्षाथी कथन छे. ते बाह्यवस्तुनो लोप करती नथी. बाह्य चीज बाह्य चीजमां तो छे, ते आत्मामां नथी. राग रागपणे छे, पर्याय पण पर्यायपणे छे. कोई बाह्य वस्तु अभावरूप नथी. अमारे त्यां तो नयविवक्षा छे. निश्चयनयना विषयनो अनुभव थतां द्वैत देखातुं नथी एम छे. एम कहेवाथी बाह्य चीज, राग, पर्याय नथी एम नथी. शुद्ध द्रव्य अनुभवमां आवतां विकल्प मटी जाय छे एटलुं ज प्रयोजन छे. पूर्णानंदनो नाथ जे शुद्ध ज्ञायकभाव एना तरफना झूकावथी ज्यारे अनुभव थाय छे त्यारे भेदनो विकल्प मटी जाय छे. भेद वस्तु जगतमां नथी एम नथी.
वेदांत एक ज सर्वव्यापक कहे छे, पण एम नथी. अनंत आत्मा (संख्याए) छे. एकेएक आत्मा (असंख्यात प्रदेशी) शरीर-प्रमाण छे. आत्मा (क्षेत्रथी) सर्वव्यापक नथी. एक आत्मामां अनंत गुणो छे अने ते अनंत गुणोमां एक समयमां अनंत पर्यायो थाय छे. आ बधानी सत्ता (होवापणुं) राखीने अभेदना अनुभवमां एनो (पर सत्ता अने भेदनो) विकल्प मटी जाय छे एम वात छे. वस्तु मटी जाय छे एम नहीं.
अरेरे! जैनदर्शन शुं छे एने यथार्थ समज्या विना जैनमां पण कोई लोकोने वेदांतनी श्रद्धा होय छे. जैनदर्शनमां तो परमानंदस्वरूप, अतीन्द्रियआनंदनुं धाम, शुद्ध-चेतनामात्रवस्तु जे छे तेमां एकाग्र थतां भेदनो विकल्प मटी जाय छे अने व्यक्त परमा-