आत्मा-एम बेपणुं ज भासतुं नथी. अनुभवमां एकपणे जे चीजनो अनुभव छे ते ज भासे छे. घणुं सूक्ष्म, भाई. (उपयोग सूक्ष्म करे तो समजाय एम छे.)
भेदनेअत्यंत गौण करीने कह्युं छे के-प्रमाण-नयादि भेदनी तो वात ज शी? भेदने गौण करवो एटले आ पर्याय छे, आ द्रव्य छे-एम भेदनुं लक्ष छोडी देवुं. पर्याय नथी एम पर्यायनो अभाव करीने लक्ष छोडी देवुं एम नहीं, पण पर्यायने गौण करीने-पेटामां राखीने एनुं लक्ष छोडी देवानी वात छे.
भगवान आत्मा नित्य, ध्रुव, आदि-अंत विनानी, परमपारिणामिकभावरूप, अखंड अभेद वस्तु छे, त्रिकाळ शुद्ध छे. एने वर्तमान हालतथी जोवामां आवे तो पर्याय छे. पर्याय कहो, हालत कहो, दशा कहो, अंश कहो, अवस्था कहो बधुं एकार्थ छे. परंतु शुद्धचैतन्यघन शाश्वत एक ज्ञायकभावनी द्रष्टि थतां पर्यायनो भेद गौण थई जाय छे. द्रव्यने विषय तो पर्याय करे छे, पण तेमां पर्यायभेद गौण थई जाय छे. वर्तमान पर्याय त्रिकाळीमां द्रष्टि करी झूके त्यां अभेद एकरूप आत्मानो अनुभव थाय छे. ए सम्यग्दर्शन छे.
भाई! तारे सम्यग्दर्शन प्रगट करवुं होय तो पर्यायमात्रने गौण करी असत्यार्थ कर. नियमसार गाथा प०मां निर्मळ पर्यायने परद्रव्य कही छे, गौण करीने असत्यार्थ कही छे; केमके जेम परद्रव्यमांथी नवी पर्याय आवती नथी एवी रीते पर्यायमांथी नवी पर्याय आवती नथी. अहीं कहे छे-शुद्ध ज्ञानानंदस्वभावी जे आत्मा एनो अनुभव थतां द्वैत ज प्रतिभासतुं नथी, प्रमाण, नय, निक्षेपनी तो वात ज शुं? एकाकार चिन्मात्र ज देखाय छे.
आ समज्या विना व्रत, तप अने भक्ति आदि बधुं वर विनानी जान जेवुं छे. आत्मा ‘वर’ जे मुख्य चीज छे तेने छोडी लोको क्रियाकांडमां चढी गया छे. ए क्रियाकांडमां बहारथी बीजा करतां विशेष देखाय तो ओ हो हो एम एने महिमा थई जाय छे. पण प्रभु! एकवार सत्य शुं छे ए सांभळ तो खरो. आ वीतरागनो मार्ग तो लोको माने छे एनाथी जुदो अलौकिक छे. कोईनी साथे एनी मेळवणी थई शके तेम नथी. भगवान सर्वज्ञ एम फरमावे छे के आ अखंड आनंदस्वरूप चैतन्यघन जे वस्तु एमां द्रव्यकर्म अने राग तो नथी पण जे वर्तमान पर्याय वस्तुनो अनुभव करे छे ते पर्याय पण वस्तु-द्रव्यमां नथी. पर्यायमां त्रिकाळीनो अनुभव थाय तोपण पर्यायमां द्रव्य आवतुं नथी पण (त्रिकाळी) द्रव्यनुं ज्ञान आवे छे. आवी अपूर्व वात छे, भाई! आवी एकरूप