Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२१० [ समयसार प्रवचन

भाई, परना ग्रहण-त्याग आत्मामां छे नहीं. परनो त्याग कर्यो एम मानवुं ए मिथ्यात्व छे में बधुं छोडी दीधुं एवुं अभिमान (मान्यता) ए पण मिथ्यात्व छे. अने एवा लोकोने त्यागी माने ए बधा मिथ्याद्रष्टि छे. केमके परवस्तुने आत्माए ग्रही नथी तो छोडे कयांथी? पर चीज-शरीर, मन, वाणी, स्त्री, पुत्र, संपत्ति, देश इत्यादिनुं ग्रहण कर्युं होय तो त्याग होय. पण एनुं ग्रहण कर्युं ज नथी ने. हा, पर्यायमां विकारने अज्ञानभाव वडे ग्रहण कीधो छे. एनो त्याग ए पण कथनमात्र छे. रागना त्यागनो कर्ता मानवो ए व्यवहार कथनमात्र छे. परमार्थे रागनो कर्ता आत्मा नथी. समयसार गाथा ३४ मां आवे छे के-परमार्थे परभावना त्यागनो कर्ता आत्मा नथी. आत्मा तो चैतन्यचमत्कार-मात्र तेजःपुंज छे. तेमां राग छे अने एने छोडवो एवुं छे नहीं. राग परवस्तु छे, तेथी रागने छोडवो ए पण नथी. बहु झीणुं पडे एटले कहे आ तो निश्चयनी वातो छे, पण आ तो वस्तुस्वरूपनो भगवाननो कहेलो मार्ग छे.

भगवाननी वाणी सांभळवा एकावतारी इन्द्रो आवे छे. सौधर्म-देवलोक छे ने? तेनां ३२ लाख विमान होय छे. एक एक विमानमां असंख्य देव छे. एनो स्वामी शक्रेन्द्र एकावतारी होय छे. ते एक भव करी मोक्ष जशे. अने एनी हजारो इंद्राणी पैकी जे मुख्य पटराणी छे ते पण एकावतारी होय छे. ते पण त्यांथी नीकळी मनुष्य थईने मोक्ष जशे. अहाहा...! ते ज्यारे समोसरणमां दिव्यध्वनि सांभळता हशे, गणधरो, मुनिवरो सांभळता हशे ते दिव्यध्वनि-जिनवाणी केवी हशे? दया पाळो एवी वात तो कुंभारे य कहे छे. अहीं तो परमेश्वरनी वाणी अनुसार कहे छे के परनी दया तो आत्मा पाळी शकतो नथी, परंतु परनी दयानो जे विकल्प ऊठे छे ते राग छे, ए आत्मानी हिंसा छे. तथा परनी दया पाळी शकुं छुं ए मान्यता मिथ्यात्व छे.

आवो मार्ग छे, भगवान! बधा आत्मा स्वभावे भगवान छे. एवा भगवान आत्मानो अनुभव थतां अनेक प्रकारना नयविकल्पो उत्पन्न थता नथी, तथा ‘प्रमाणं अस्तं एति’ प्रमाण अस्त थई जाय छे. केवळज्ञान प्रत्यक्ष अने मति-श्रुतज्ञान परोक्ष छे एवा विकल्प अस्त पामी जाय छे. ‘अपि च’ अने ‘निक्षेपचक्रम् क्वचित् याति, न विद्मः’ निक्षेपोनो समूह कयां जतो रहे छे ए अमे जाणता नथी. आत्मानुभवमां नाम, स्थापनादि निक्षेपोना विकल्पो नाश पामी जाय छे. ‘किम् अपरम् अभिदध्मः’ आथी अधिक शुं कहीए? ‘द्वैतम् एव न भाति’ द्वैत ज भासतुं नथी. अहाहा...! शुद्ध चैतन्यघन परम सामान्यस्वभाव जीववस्तुनो अनुभव थतां बेपणुं ज भासतुं नथी. गुण-गुणीनो भेद तो दूर रहो, पण आ अनुभवनी पर्याय अने जेने अनुभवे-जाणे ते आ त्रिकाळी शुद्ध