Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 216 of 4199

 

भाग-१ ] २०९

आदिनुं आलंबन रहेतुं नथी. त्यारपछी ‘णमो सिद्धाणं’-सिद्ध अवस्था प्रगट थाय छे, त्यां पण कोई आलंबन नथी. ए प्रमाणे सिद्ध अवस्थामां प्रमाण-नय-निक्षेपनो अभाव ज छे.

हवे ए अर्थनो कलशरूप श्लोक कहे छे.

* कळश–९ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *

आचार्य शुद्धनयनो अनुभव करी कहे छे एटले के पूर्णानंदस्वरूप भगवान आत्मानां श्रद्धान, ज्ञान अने लीनता करी कहे छे के-‘अस्मिन् सर्वङ्कषे धाम्नि अनुभवम् उपयाते’ आ सर्व भेदोने गौण करनार जे शुद्धनयनो विषयभूत चैतन्यचमत्कारमात्र तेजःपुंज आत्मा, तेनो अनुभव थतां ‘नयश्रीः न उदयति’ नयोनी लक्ष्मी उदय पामती नथी.

शुं कहे छे? शुद्धनय जे ज्ञाननी पर्याय छे एनो विषय त्रिकाळी वस्तु शुद्ध चैतन्यचमत्कारमात्र तेजःपुंज छे. भगवान आत्मा त्रणकाळ त्रणलोकने जाणी शके एवी शक्तिथी परिपूर्ण चैतन्यचमत्कार वस्तु प्रकाशमान ज्ञानज्योतिस्वरूप छे. शुद्धनय, सर्व-भेदोने-नवतत्त्वना भेदोने गौण करी एटले अजीव जे जड छे तेनुं लक्ष छोडी, अंदर पुण्य-पाप जे थाय छे तेनुं लक्ष छोडी, तथा संवर, निर्जरा, मोक्ष जे (ध्रुवनी अपेक्षा) बहिःतत्त्व छे एनुं पण लक्ष छोडी एक त्रिकाळी शुद्ध चैतन्यचमत्कारमात्र वस्तु आत्माने देखे छे. अज्ञानीने दया, दानादि रागना, नवतत्त्वना भेदोना प्रेमनी आडमां चैतन्यचमत्कारमात्र आत्मा देखातो नथी. परंतु शुद्धनय ए सर्व भेदोने गौण करी अनंत शक्तिसंपन्न त्रिकाळी शुद्ध जीववस्तुने देखे छे, अनुभवे छे. तेनो अनुभव थतां, तेने अनुसरीने वेदन थतां नयोनी लक्ष्मी उदय पामती नथी.

तेनो अनुभव थतां-कोनो? शुद्धनयना विषयभूत, ध्यानना ध्येयभूत जे चैतन्यचमत्कारमात्र वस्तु ध्रुव छे तेनो. अहाहा...! ध्याननुं ध्येय जे पूर्णात्मा- आनंदकंद चैतन्यचमत्कार तेनो अनुभव थतां नयोनी लक्ष्मी उदय पामती नथी, एटले आ द्रव्यार्थिक नये द्रव्य छे अने पर्यायार्थिकनये पर्याय छे एवा नयविकल्पो उत्पन्न थता नथी.

कोई कहे आवो धर्म ते कई जातनो? आ ते शुं जैनधर्म छे? शुं सर्वज्ञ परमेश्वरे आवुं कह्युं हशे? अत्यारसुधी तो ब्रह्मचर्य पाळवुं, लीलोतरी न खावी, कंदमूळ न खावां, दया पाळवी इत्यादिने धर्म मानता हता.