शरीर, मन, वाणी ए तो माटी-जड-धूळ छे. ए कोई आत्मा नथी. अंदर ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय आदि कर्म छे ए पण जड-धूळ छे. वळी दया, दान, पूजा, भक्ति वगेरे जे शुभभाव थाय छे ते पुण्य-राग छे, तथा हिंसा, जूठ, चोरी, भोग, विषय-वासना ए पाप-राग छे. आ पुण्य-पापना रागथी भिन्न अंदर जे त्रिकाळ ध्रुव आत्मवस्तु चैतन्यरूप छे एने वर्तमान ज्ञाननी पर्यायमां लक्षमां लेवी एने ज्ञान (सम्यग्ज्ञान) कहेवामां आवे छे.
नियमसारमां गाथा त्रणमां आवे छे के-‘परद्रव्यने अवलंब्या विना निःशेषपणे अंतर्मुख योगशक्तिमांथी उपादेय एवुं जे निज परमतत्त्वनुं परिज्ञान ते ज्ञान छे.’ परिज्ञान कहेतां समस्त प्रकारे ज्ञान थवुं-जेवो आत्मा पूर्ण-परिपूर्ण छे एवुं ज्ञान थवुं एनुं नाम सम्यग्ज्ञान छे. शास्त्रनुं भणतर-ज्ञान ए कांई ज्ञान नथी.
ज्ञान-श्रद्धान सिद्ध थया पछी श्रद्धान माटे प्रमाणादिनी कोई आवश्यकता नथी. पछी प्रमाण, नय, निक्षेपथी वस्तुस्वरूप सिद्ध करवानुं रहेतुं नथी. अनुभवमां आवी गयुं के आत्मा पूर्णानंदस्वरूप छे एटले एनां सम्यग्ज्ञान अने प्रतीति थई गयां. हवे ए पूर्णस्वरूपमां स्थिरता करवानुं ज बाकी छे.
परंतु हवे ए बीजी अवस्थामां प्रमाणादिना आलंबनथी विशेषज्ञान थाय छे अने राग-द्वेष-मोहकर्मना सर्वथा अभावरूप यथाख्यात चारित्र प्रगटे छे. एटले के ज्ञान-श्रद्धान सिद्ध थया पछी ज्यांसुधी पूर्ण चारित्र प्रगट न थाय त्यांसुधी नय- निक्षेपथी जाणवुं होय छे. नय-निक्षेपथी चारित्रना स्वरूपनुं ज्ञान थवुं (विकल्प ऊठे ते) ए व्यवहार चारित्र छे. अने अंदर ज्ञानस्वरूपमां अतीन्द्रिय आनंदरूप स्थिरता थवी ए निश्चयचारित्र छे. देहनी क्रिया ए तो जड-पुद्गलनी क्रिया छे, ए कांई चारित्र नथी. अंदर अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अने अपरिग्रह एवा पांच महाव्रतना विकल्प ऊठवा ए पण रागभाव छे. एनाथी रहित परिपूर्ण आनंदमूर्ति भगवान आत्मामां निर्विकल्प स्थिरता थवी ए चारित्र छे. आम नय-निक्षेपथी चारित्रनुं स्वरूप जाणी आनंदनो नाथ परिपूर्ण भगवान आत्मा जे ज्ञान-श्रद्धानमां लीधो छे तेमां चरवुं, रमवुं, स्थिर थवुं ए निश्चयचारित्र छे. त्रिकाळीमां लीन थवुं, पण ज्ञान-श्रद्धानमां लीन थवुं एम कह्युं नथी; केमके ए तो पर्याय छे.
(क्रमशः) त्रिकाळी भगवान आत्मामां परिपूर्ण लीनता करवाथी राग-द्वेष- मोहनो सर्वथा अभाव थाय छे अने यथाख्यात चारित्र प्रगट थाय छे. जेवी स्वरूपस्थिति छे तेवी पर्यायमां प्रगट थाय छे; तेथी केवळज्ञान प्रगट थाय छे. केवळज्ञान थया पछी प्रमाण