आ रीते भूतार्थ-सत्यार्थ द्रष्टिथी जोईए तो प्रमाण-नय-निक्षेपोमां एक जीव ज प्रकाशमान छे. त्रिकाळी एकरूप ज्ञायकभाव ज आत्मा छे. एवा आत्मानी द्रष्टि अने अनुभव करवो एनुं नाम सम्यग्दर्शन छे अने त्यांथी धर्मनी शरूआत थाय छे.
आ प्रमाण-प्रत्यक्ष अने परोक्ष, नय-द्रव्यार्थिक अने पर्यायार्थिक, तथा निक्षेपनाम, स्थापना, द्रव्य अने भाव-आ त्रणेनुं विस्तारथी व्याख्यान ते विषयना ग्रंथोमांथी जाणवुं. तेमनाथी द्रव्य-पर्यायस्वरूप वस्तुनी सिद्धि थाय छे. शुं कहे छे? द्रव्य नाम वस्तु अने पर्याय नाम अवस्था-हालत. आदि-अंत विनानी त्रिकाळ ध्रुव अविनाशी चीज आत्मवस्तु एने द्रव्य कहे छे. एनी बदलती दशा-मति, श्रुत आदिने पर्याय कहे छे. आवी द्रव्य-पर्यायस्वरूप वस्तु छे. वेदांत एकला द्रव्यने-कूटस्थने ज माने छे, बौद्ध एकली पर्यायने ज माने छे. भगवान सर्वज्ञे द्रव्य पर्यायस्वरूप वस्तुने जाणी छे अने एवी ज कही छे. आवी द्रव्यपर्यायस्वरूप वस्तुने प्रथम अवस्थामां सिद्ध करवा माटे ए प्रमाण, नय, निक्षेप बराबर छे. (होय छे) एनाथी वस्तुनी सिद्धि थाय छे. आ सम्यग्ज्ञाननी वात नथी. (आम जाणवाथी सम्यग्ज्ञान थाय एम कहेवुं नथी.) ज्ञानना विशेष भेद छे एटलुं. साधक अवस्थामां तेओ सत्यार्थ ज छे. त्रिकाळी ज्ञायकभाव ए द्रव्य छे, एक समयनी पर्याय ए भेद छे एम साधवुं ए व्यवहारथी सत्यार्थ छे, केमके ज्ञानना ए विशेषो छे, एना विना वस्तुने साधवामां आवे तो विपरीतता थई जाय. एनाथी वस्तुनी यथार्थ सिद्धि थाय छे, अन्यथा विपरीतता थई जाय छे.
हवे कहे छे अवस्था अनुसार व्यवहारना अभावनी पण रीत छेः- प्रथम अवस्थामां प्रमाण, नय, निक्षेपथी यथार्थ वस्तुने जाणी ज्ञान-श्रद्धाननी सिद्धि करवी. शुं कहे छे? प्रथम प्रमाण-नय-निक्षेप द्वारा वस्तुने साधीने यथार्थ निर्णय करवो के वस्तु-आत्मा त्रिकाळ एकरूप अखंड चैतन्यघनस्वरूप छे. एनां ज्ञान-श्रद्धान (विकल्परूप) करवां व्यवहारनी वात छे.
ज्ञान-श्रद्धान सिद्ध थया पछी चैतन्यमूर्ति भगवान ज्ञायकदेव-जे चैतन्यना नूरना तेजनुं पूर एवा आत्मानुं ज्ञान करवुं. अहीं ज्ञाननी पर्यायमां पूर्ण शुद्धजीववस्तुनुं ज्ञान थवुं एने ज्ञान करवुं एम कह्युं छे. पर्यायमां त्रिकाळी आत्मानुं ज्ञान थवुं एने आत्मज्ञान-सम्यग्ज्ञान कहे छे. पहेलां प्रमाण, नय, निक्षेपथी वस्तुने यथार्थ जाणी ज्ञान-श्रद्धान करवुं एम कह्युं हतुं ए तो व्यवहारथी मन वडे विकल्पमां निर्णय करवानी वात हती. अहीं तो वस्तुतत्त्वना अंतर अनुभवपूर्वक सम्यग्दर्शन- सम्यग्ज्ञाननी वात करी छे.