Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२२४ [ समयसार प्रवचन

(वसंततिलका)
आत्मानुभूतिरिति शुद्धनयात्मिका या
ज्ञानानुभूतिरियमेव किलेति बुद्ध्वा।
आत्मानमात्मनि निवेश्य सुनिष्प्रकम्प
मेकोऽस्ति नित्यमवबोधघनः समन्तात्।।
१३।।

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भावार्थः– शुद्धनयनी द्रष्टिथी जोवामां आवे तो सर्व कर्मोथी रहित चैतन्यमात्र

देव अविनाशी आत्मा अंतरंगमां पोते विराजी रह्यो छे. आ प्राणी-पर्यायबुद्धि बहिरात्मा-तेने बहार ढूंढे छे ते मोटुं अज्ञान छे. १२.

हवे, शुद्धनयना विषयभूत आत्मानी अनुभूति छे ते ज ज्ञाननी अनुभूति छे एम आगळनी गाथानी सूचनाना अर्थरूप काव्य कहे छेः-

श्लोकार्थः– [इति] ए रीते [या शुद्धनयात्मिका आत्म–अनुभूतिः] जे पूर्वकथित शुद्धनयस्वरूप आत्मानी अनुभूति छे [इयम् एव किल ज्ञान–अनुभूतिः] ते ज खरेखर ज्ञाननी अनुभूति छे [इति बुद्ध्वा] एम जाणीने तथा [आत्मनि आत्मानम् सुनिष्प्रकम्पम् निवेश्य] आत्मामां आत्माने निश्चळ स्थापीने, [नित्यम् समन्तात् एकः अवबोध–घनः अस्ति] ‘सदा सर्व तरफ एक ज्ञानघन आत्मा छे’ एम देखवुं.

भावार्थः– पहेलां सम्यग्दर्शनने प्रधान करी कह्युं हतुं; हवे ज्ञानने मुख्य करी कहे छे के आ शुद्धनयना विषयस्वरूप आत्मानी अनुभूति छे ते ज सम्यग्ज्ञान छे. १३.