Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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भाग-१ ] २२प

प्रवचन नंबरः दिनांकः प्रवचन नंबरः दिनांकः
४२ ११-१-७६ ४७ १६-१-७६
४३ १२-१-७६ ४८ १७-१-७६
४४ १३-१-७६ ४९ १८-१-७६ अने
४प १४-१-७६ प० १९-१-७६
४६ १प-१-७६
* समयसार गाथा–१४ *

हवे शुद्धनयने गाथासुत्रथी कहे छेः-

केवो जीव जाणवाथी जीव जाण्यो कहेवाय ए वात करे छे. खरेखर भगवान आत्मा अबद्ध छे, राग अने कर्मना संबंध विनानी चीज छे. (ज्ञाननी) पर्यायमां रागनी साथे निमित्त नैमित्तिक संबंध ए तो व्यवहार छे, परंतु रागनो कर्मनी साथे जे निमित्त-नैमित्तिक संबंध ए पण असद्भूत व्यवहार छे. आत्मा अबद्ध कहेतां राग अने कर्मना संबंध विनानी त्रिकाळी चीज छे एनी अंतर्द्रष्टि करवी ए सम्यग्दर्शन अने सम्यग्ज्ञान छे. एवा आत्माने जाणे त्यारे आत्माने जाण्यो एम खरेखर कहेवामां आवे छे.

* गाथा–१४ः गाथार्थ उपरनुं प्रवचन *

यः जे नय आत्मानम् आत्माने अबद्धस्पृष्टम् बंधरहित अने परना स्पर्शरहित, अनन्यकं अन्यपणा रहित, नियतम् चळाचळता रहित, अविशेषम् विशेष रहित, असंयुक्तम् अन्यना संयोग रहित-एवा पांचभावरूप पश्यति देखे छे तं तेने, हे शिष्य! तुं शुद्धनयं शुद्धनय विजानिहि जाण.

जुओ, निश्चयनय-शुद्धनय आत्माने अबद्धस्पृष्ट जुए छे, बंधरहित अने परना स्पर्शरहित जुए छे. अबद्धस्पृष्टने अबद्धस्पृष्ट स्वभाव देखतो नथी. अबद्धस्पृष्ट ए तो त्रिकाळी वस्तु छे. एवा त्रिकाळी वस्तु तरफ निर्मळ ज्ञाननी पर्याय झूके छे त्यारे अबद्धस्पृष्टनो अनुभव थाय छे. एने शुद्धोपयोग कहे छे. त्रिलोकनाथ जिनेन्द्रदेवनुं जिनशासन ए शुद्धोपयोग छे. ए शुद्धोपयोग आत्माने अबद्धस्पृष्ट एटले बंधरहित अने परना स्पर्शरहित, अन्यपणा रहित नाम अनेरी नरनारकादि गति रहित, चळाचळता रहित कहेतां वृद्धि-हानि रहित, विशेष रहित एटले गुण-गुणीना भेद रहित