हवे शुद्धनयने गाथासुत्रथी कहे छेः-
केवो जीव जाणवाथी जीव जाण्यो कहेवाय ए वात करे छे. खरेखर भगवान आत्मा अबद्ध छे, राग अने कर्मना संबंध विनानी चीज छे. (ज्ञाननी) पर्यायमां रागनी साथे निमित्त नैमित्तिक संबंध ए तो व्यवहार छे, परंतु रागनो कर्मनी साथे जे निमित्त-नैमित्तिक संबंध ए पण असद्भूत व्यवहार छे. आत्मा अबद्ध कहेतां राग अने कर्मना संबंध विनानी त्रिकाळी चीज छे एनी अंतर्द्रष्टि करवी ए सम्यग्दर्शन अने सम्यग्ज्ञान छे. एवा आत्माने जाणे त्यारे आत्माने जाण्यो एम खरेखर कहेवामां आवे छे.
यः जे नय आत्मानम् आत्माने अबद्धस्पृष्टम् बंधरहित अने परना स्पर्शरहित, अनन्यकं अन्यपणा रहित, नियतम् चळाचळता रहित, अविशेषम् विशेष रहित, असंयुक्तम् अन्यना संयोग रहित-एवा पांचभावरूप पश्यति देखे छे तं तेने, हे शिष्य! तुं शुद्धनयं शुद्धनय विजानिहि जाण.
जुओ, निश्चयनय-शुद्धनय आत्माने अबद्धस्पृष्ट जुए छे, बंधरहित अने परना स्पर्शरहित जुए छे. अबद्धस्पृष्टने अबद्धस्पृष्ट स्वभाव देखतो नथी. अबद्धस्पृष्ट ए तो त्रिकाळी वस्तु छे. एवा त्रिकाळी वस्तु तरफ निर्मळ ज्ञाननी पर्याय झूके छे त्यारे अबद्धस्पृष्टनो अनुभव थाय छे. एने शुद्धोपयोग कहे छे. त्रिलोकनाथ जिनेन्द्रदेवनुं जिनशासन ए शुद्धोपयोग छे. ए शुद्धोपयोग आत्माने अबद्धस्पृष्ट एटले बंधरहित अने परना स्पर्शरहित, अन्यपणा रहित नाम अनेरी नरनारकादि गति रहित, चळाचळता रहित कहेतां वृद्धि-हानि रहित, विशेष रहित एटले गुण-गुणीना भेद रहित