Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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२२६ [ समयसार प्रवचन

अने अन्यना संयोग रहित एटले कर्म अने कर्मना निमित्ते जे विकार, दुःख थाय छे एनाथी रहित एम पांच भावोथी रहित देखे छे. पांच भावोथी रहित एम कह्युं ने? एनो अर्थ ज एम थयो के एवा पांच भावो छे. पण एनाथी रहित जे आत्माने देखे छे एने हे शिष्य! तुं शुद्धनय जाण. कुंदकुंदाचार्य शिष्यने आदेश करी कहे छे के आ अबद्धस्पृष्ट आदि जे पांच भावो सहित जे एकरूप शुद्धवस्तु ते शुद्धना अनुभवने तुं शुद्धनय जाण. आ पांच भावो समजाववामां क्रम पडे छे, अनुभवमां क्रम नथी. वस्तुनुं स्वरूप अर्थात् जिनशासननो आत्मा आवो कहेवामां आवे छे. * गाथा–१४ टीका उपरनुं प्रवचन *

निश्चयथी आ ज्ञायकभावस्वरूप आत्मा अबद्धस्पृष्ट छे. अबद्ध कहेतां राग अने कर्मना बंधथी रहित छे. तथा अस्पृष्ट कहेतां जे विस्रसा परमाणुओ (कर्म बंधावाने योग्य परमाणुओ जे एक-क्षेत्रावगाही छे) तेना स्पर्शथी रहित छे. वळी ते अनन्य छे. अनेरी अनेरी जे नर-नारकादि पर्यायो तेथी रहित छे. वळी ते नियत छे. ज्ञान अने बीजा अनंत गुणोनी पर्यायोमां हीनाधिकपणुं थाय छे ए अनियत छे. एनाथी रहित भगवान आत्मा नियत छे. ज्ञान, दर्शन, आनंद आदि गुणोना जे विशेषो-भेदो ए द्रव्य सामान्यमां नथी तेथी अविशेष छे. तथा कर्मना निमित्तथी जे विकारी शुभाशुभभावो पर्यायमां उत्पन्न थाय छे एनाथी भगवान आत्मा असंयुक्त छे, संबंध रहित छे.

आवा अबद्धस्पृष्ट, अनन्य, नियत, अविशेष अने असंयुक्त आत्मानी जे अनुभूति ते शुद्धनय छे. जोयुं? आत्मानी अनुभूति ते शुद्धनय छे. सामान्य, एक ध्रुव चैतन्यस्वरूपने अनुसरीने शांति अने आनंदनो जे अनुभव थयो ए शुद्धनय छे. एक त्रिकाळीनुं लक्ष करतां पर्यायमां जे द्रव्य त्रिकाळी जणायुं ते शुद्धनय छे. अने ए अनुभूति आत्मा ज छे. आत्मानुं परिणाम होवाथी अनुभूति ए आत्मा ज छे. आत्माना आनंदनुं वेदन आव्युं ए आत्मा ज छे. शुद्धनय कहो, आत्मानुभूति कहो के आत्मा कहो ए बधुं एक ज छे, जुदां नथी. अभेदथी अनुभूति अने अनुभूतिनो विषय आत्मा एक कह्यां छे. आ रीते आत्मा एक ज प्रकाशमान छे, रागादि अनात्मा प्रकाशमान थता नथी.

एक बाजु गाथा ३८ मां एम कह्युं के खरेखर तो पर्याय विनानो जे त्रिकाळी एक ज्ञायकभाव तेने आत्मा कहीए. आत्मा एक त्रिकाळी ज्ञायकभाव छे एम अनेक स्थळे आवे छे. पण एनी अनुभूति ज्ञानमां थई त्यारे ख्यालमां आव्युं के आत्मा त्रिकाळी