Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration). Gatha: 15.

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गाथा–१प
जो पस्सदि अप्पाणं अबद्धपुट्ठं अणण्णमविसेसं।
अपदेससंतमज्झं पस्सदि जिणसासणं सव्वं।।
१५।।

यः पश्यति आत्मानम् अबद्धस्पृष्टमनन्यमविशेषम्।
अपदेशसान्तमध्यं पश्यति जिनशासनं
सर्वम्।। १५।।

हवे, आ अर्थरूप गाथा कहे छेः-

अबद्धस्पृष्ट, अनन्य, जे अविशेष देखे आत्मने,
ते द्रव्य तेम ज भाव जिनशासन सकल देखे खरे. १प.

गाथार्थः– [यः] जे पुरुष [आत्मानम्] आत्माने [अबद्धस्पृष्टम्] अबद्धस्पृष्ट, [अनन्यम्] अनन्य, [अविशेषम्] अविशेष (तथा उपलक्षणथी नियत अने असंयुक्त [पश्यति] देखे छे ते [सर्वम् जिनशासनं] सर्व जिनशासनने [पश्यति] देखे छे,-के जिनशासन [अपदेशसान्तमध्यं] बाह्य द्रव्यश्रुत तेम ज अभ्यंतर ज्ञानरूप भावश्रुतवाळुं छे.

टीकाः– जे आ अबद्धस्पृष्ट, अनन्य, नियत, अविशेष अने असंयुक्त एवा पांच भावोस्वरूप आत्मानी अनुभूति छे ते निश्चयथी समस्त जिनशासननी अनुभूति छे, कारण के श्रुतज्ञान पोते आत्मा ज छे. तेथी ज्ञाननी अनुभूति ते ज आत्मानी अनुभूति छे. परंतु हवे त्यां, सामान्य ज्ञानना आविर्भाव (प्रगटपणुं) अने विशेष (ज्ञेयाकार) ज्ञानना तिरोभाव (आच्छादन) थी ज्यारे ज्ञानमात्रनो अनुभव करवामां आवे त्यारे ज्ञान प्रगट अनुभवमां आवे छे. तोपण जेओ अज्ञानी छे, ज्ञेयोमां आसक्त छे तेमने ते स्वादमां आवतुं नथी. ते प्रगट द्रष्टांतथी बतावीए छीएः _________________________________________________________________ * पाठान्तरः अपदेससुत्तमज्झं १. अपदेश= द्रव्यश्रुत; सान्त=ज्ञानरूपी भावश्रुत.