र्महः परममस्तु नः सहजमुद्विलासं सदा।
चिदुच्छलननिर्भरं सकलकालमालम्बते
साध्यसाधकभावेन द्विधैकः
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अमने हो [यत् सकलकालम् चिद्–उच्छलन–निर्भरं] के जे तेज सदाकाळ चैतन्यना परिणमनथी भरेलुं छे, [उल्लसत्–लवण–खिल्य–लीलायितम्] जेम मीठानी कांकरी एक क्षाररसनी लीलानुं आलंबन करे छे तेम जे तेज [एक–रसम् आलम्बते] एक ज्ञानरस स्वरूपने अवलंबे छे, [अखण्डितम्] जे तेज अखंडित छे -ज्ञेयोना आकाररूपे खंडित थतुं नथी, [अनाकुलं] जे अनाकुळ छे-जेमां कर्मना निमित्तथी थता रागादिथी उत्पन्न आकुळता नथी, [अनन्तम् अन्तः बहिः ज्वलत्] जे अविनाशीपणे अंतरंगमां अने बहारमां प्रगट देदीप्यमान छे-जाणवामां आवे छे, [सहजम्] जे स्वभावथी थयुं छे -कोईए रच्युं नथी अने [सदा उद्विलासं] हंमेशा जेनो विलास उदयरूप छे-जे एकरूप प्रतिभासमान छे.
अमने सदा प्राप्त रहो. १४.
हवे, आगळनी गाथानी सूचनारूपे श्लोक कहे छेः-
श्लोकार्थः– [एषः ज्ञानघनः आत्मा] आ (पूर्वकथित) ज्ञानस्वरूप आत्मा छे ते [सिद्धिम् अभीप्सुभिः] स्वरूपनी प्राप्तिना ईच्छक पुरुषोए [साध्यसाधकभावेन] साध्यसाधकभावना भेदथी [द्विधा] बे प्रकारे, [एकः] एक ज [नित्यम् समुपास्यताम्] नित्य सेववायोग्य छे; तेनुं सेवन करो.
भावार्थः– आत्मा तो ज्ञानस्वरूप एक ज छे परंतु एनुं पूर्णरूप साध्य भाव छे अने अपूर्णरूप साधकभाव छे; एवा भावभेदथी बे प्रकारे एकने ज सेववो. १प.