Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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प्रवचन नंबरः दिनांकः प्रवचन नंबरः दिनांकः
प१ २०-१-७६ प२ २१-१-७६
प३ २२-१-७६ प४ २३-१-७६

* समयसार गाथा –१प *

समस्त जैनशासनना रहस्यनी आ गाथा छे सर्वज्ञ परमेश्वरनो जे मार्ग छे ए ज जैनशासननो मोक्षमार्ग छे.

* गाथा –१पः गाथार्थ उपरनुं प्रवचन *

‘यः’ जे पुरुष ‘आत्मानम्’ शुद्धआनंदघन चैतन्यस्वरूप आत्माने ‘अबद्धस्पृष्टम्’ अबद्धस्पृष्ट अर्थात् कर्मनी साथे बंध अने स्पर्श रहित, ‘अनन्यम्’ अनन्य् अर्थात् मनुष्य, नरक आदि अन्य अन्य गतिथी रहित, ‘अविशेषम्’ अविशेष अर्थात् ज्ञान, दर्शन आदि गुणभेद रहित सामान्य एकरूप तथा उपलक्षणथी (बे बोल आ गाथामां नथी पण १४मी गाथामां आवी गया छे) नियत एटले वृद्धिहानिरूप अवस्थाथी रहित अने असंयुक्त अर्थात् पुण्य अने पाप, सुख-दुःखरूप कल्पनाओथी रहित ‘पश्यति’ देखे छे एटले के अंतरमां अनुभवे छे ते ‘सर्वम् जिनशासनम्’ सर्व जिनशासनने ‘पश्यति’ देखे छे. समस्त जैनशासननुं रहस्य ते आत्माए जाणी लीधुं. भगवान आत्मा नित्य मुक्तस्वरूप शुभाशुभभावरहित त्रिकाळ शुद्ध चैतन्यवस्तु छे. एवा आत्मानो अभ्यंतर ज्ञानथी (भावश्रुत ज्ञानथी) अनुभव करवो ए (अनुभव) शुद्धोपयोग छे. ए वीतरागी पर्याय छे अने ए ज जैनधर्म छे. राग विनानी वीतरागी दशा ते जैनशासन छे अने ए ज जैनधर्मनुं रहस्य छे.

आत्मा जे त्रिकाळी वस्तु छे ए जिनस्वरूप ज छे. जिनवरमां अने आत्मामां कांई फेर नथी. कह्युं छे नेः-

“जिन सोही है आतमा, अन्य सोही है कर्म,
यही वचनसे समज ले जिनप्रवचनका मर्म,”

प्रत्येक आत्मानो द्रव्यस्वभाव तो त्रिकाळ आवो ज एकरूप छे. जे भगवान थया ते आवा आत्मानो पूर्ण आश्रय करी पूर्ण निर्मळ पर्याय प्रगट करीने थया. शुद्धोपयोग